
संस्कृति विभाग का घोटाला, फर्जी बिलों के आधार पर किया टैक्सी वाहनों का भुगतान
रायपुर. संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में फर्जी बिल के आधार पर टैक्सी वाहनों को भुगतान करने का मामला सामने आया है। इसमें से एक बिल तो ऐसा है जिसमें वाहन का प्रकार कार लिखकर स्कूटर का नंबर अंकित कर भुगतान लिया गया है।
बिल लगाने वाली फर्म पारख ट्रेवल्स ने स्कूटर सीजी 04 केजेड 9922 को इंडिगो कार बताकर रसीद क्रमांक-060 के आधार पर 10 हजार 500 रुपए भुगतान ले लिया। विभाग ने बिल को जांचे बगैर आंख मूंदकर भुगतान भी कर दिया। स्कूटर का 1 जनवरी से 4 जनवरी 2018 तक का बिल लगाया गया था।
उस बिल के आधार पर एक दिन का 2500 रुपए और 5 प्रतिशत जीएसटी भुगतान किया गया है। विभागीय अधिकारी के भाई की ट्रेवल एजेंसी पारख ट्रेवल्स को फायदा पहुंचाने बड़ा फर्जीवाड़ा किया गया है। इसके अलावा शासन के नियमों को तोडकऱ दोगुनी दरों पर वर्षों से भुगतान किया जाता रहा है। पत्रिका को आरटीआइ से मिले दस्तावेज बतातें हैं कि संस्कृति विभाग में विशेष कार्यक्रमों के लिए वाहनों को किराए में लिया जाता है। वर्षों से पारख ट्रेवल्स यहां वाहन किराए पर उपलब्ध करा रहा है। विभाग द्वारा कुछ वाहन तो स्थायी रूप से भी अटैच किए गए हैं।
बिना टैक्सी परमिट के कर लिया अटैच
संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के अंतर्गत आने वाले गुरुघासीदास संग्रहालय के संग्रहालयाध्यक्ष पद पर कार्यरत प्रतापचंद्र पारख के रिश्तेदार राजेंद्र पारख के नाम से ट्रेवल्स एजेंसी संचालित हो रही है। वाहन क्रमांक सीजी 04 केटी 7722 का भुगतान महज 38 दिन के लिए 1 लाख से ज्यादा किया गया है। उक्त वाहन के संबंध में आरटीओ से जानकारी मांगी गई तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। यह वाहन टैक्सी परमिट नहीं, निजी वाहन के रूप में दर्ज है।
2006 से ट्रेवल कंपनी है सक्रिय : आरटीआइ से मिले दस्तावेज के मुताबिक विभाग के संग्रहालयाध्यक्ष प्रताप पारख के भाई की फर्म 2006 से संस्कृति विभाग में वाहन उपलब्ध कराने का काम कर रही है। बिल का अध्ययन करने पर पता चला कि प्रोटोकॉल रेट इंडिगो वाहन का 1600 रुपए तय किया गया है। विभागीय अधिकारी ने 2500 रुपए भुगतान कर दिया। इस संबंध में कई बार सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई है।
हर वाहन की दर है तय
छत्तीसगढ़ शासन के राज्य शिष्टाचार अधिकारी के पत्र क्रमांक 159/संस/राशिअ/ 134/2012 के मुताबिक सभी वाहनों के किराए की दर तय है। तत्कालीन राज्य शिष्टाचार अधिकारी सुनील कुमार अवस्थी ने सभी विभागों को पत्र जारी
कर निर्धारित दर पर वाहन किराए में लेने के लिए निर्देशित किया था।
प्रताप पारख, संग्रहालयाध्यक्ष
रिपोर्टर: पारख ट्रेवल्स आपका है क्या?
अधिकारी : नहीं, मेरे छोटे भाई की फर्म है।
रिपोर्टर: आपके विभाग में रहते हुए सिर्फ इसी फर्म के वाहन क्यों लगाए गए हैं?
अधिकारी: यह तो आप पता कीजिए।
रिपोर्टर: हमें दस्तावेज मिले हैं कि उन्हें फर्जी बिल पर भुगतान किया गया है?
जवाब: मुझे जानकारी नहीं है।
संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के संचालक चंद्रकांत उइके ने बताया कि मामला मेरी जानकारी से बाहर है। आपके पास जो भी दस्तावेज हैं, उन्हें मुझे भेजिए। फर्म को क्यों लगातार फर्जी और मनमाना भुगतान किया जा रहा है। इस संबंध में सख्त कार्रवाई की जाएगी।
Published on:
29 Jan 2019 11:09 am
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