
Republic Day 2023
Republic Day 2023: भारत को स्वाधीनता दिलाने के लिए आजादी के यज्ञ में वैसे तो देश के हर हिस्से के स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने जान की आहुति दे दी थी। जिसमे छत्तीसगढ़ जो उस समय मध्यपरदेश का हिस्सा हुआ करता था। यहाँ के भी कई स्वतंत्रता सेनानियों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। आज हम छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनके निडर हौसलों ने अंग्रेजी शासन को झकझोर दिया और अंग्रेजी हुकूमत को हार माननी पड़ी थी !
वीर नारायण सिंह
छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद...पराक्रम ऐसा कि जीते जी न तो उन्होंने ब्रिटिश गुलामी को स्वीकार किया और न ही सोनाखान पर अंग्रेजी हुकूमत कायम होने दी। 1857 में अंग्रेज हुक्मरानों ने उन्हें षड्यंत्र पूर्वक गिरफ्तार कर लिया। अंग्रेज उनसे इतना डरे हुए थे कि उन्हें 6 दिनों तक फांसी पर लटकाए रखा। फिर भी तसल्ली नहीं हुई तो तोप से उड़ा दिया। छत्तीसगढ़ के पहले स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर जानें जाने वाले वीर नारायण सिंह का जन्म 1795 में हुआ था। 1857 में हुई क्रांति में उन्होंने अपना योगदान दिया था। इस क्रांति में उन्हें 10 दिसंबर 1857 में जयस्तंभ चौक रायपुर में फांसी दी गई थी। नारायण सिंह को वीर की उपाधी ब्रिटिश सरकार द्वारी उनकी बहादुरी को देखते हुए दी गई थी। ये उपाधी उन्हें तब दी गई जब सोनाखान क्षेत्र में एक नरभक्षी शेर देखा गया जिससे उस क्षेत्र के लोग डर गए इस बात की खबर नारायण सिंह तक पहुंची और उन्होंने तुरंत तलवार उठाई और देखते ही देखते कुछ समय में ही उस शेर को मार गिराया। उनकी इस बाहदुरी के लिए उन्हें वीर की उपाधी दी गई।
गुरिल्ला युद्ध के लिए 500 लोगों की सेना
28 अगस्त 1857 को अंग्रेजों के भारतीय सैनिक व स्थानीय लोगों ने वीर नारायण सिंह को जेल से मुक्त करवा दिया और अपना नेता मान लिया। उन्होंने 500 लोगों की बंदूकधारी सेना बनाई। उनकी गुरिल्ला युद्ध में माहिर सेना ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। अंग्रेजों की ओर से कैप्टन स्मिथ उनसे लड़ रहे थे।
पण्डित सुन्दरलाल शर्मा
छत्तीसगढ़ के 'गांधी' के रूप में विख्यात तथा छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के प्रथम कल्पनाकार पंडित सुंदरलाल शर्मा का जन्म 21 दिसंबर 1881 में ग्राम चमसूर, राजिम में हुआ था। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में व्याप्त रुढ़िवादिता, अंधविश्वास, अस्पृश्यता तथा कुरीतियों को दूर करने के लिए आपने अथक प्रयास किया आपके हरिजनोद्धार कार्य की प्रशंसा महात्मा गांधी ने मुक्त कंठ से करते हुए, इस कार्य में आपको गुरु माना था। 1920 में धमतरी के पास कंडेल नहर सत्याग्रह आपके नेतृत्व में सफल रहा। आपके प्रयासों से ही महात्मा गांधी 20 दिसम्बर 1920 को पहली बार रायपुर आए। देश में 9वीं सदी के अंतिम चरण में राजनैतिक और सांस्कृतिक चेतना की लहरें उठ रही थीं। समाज सुधारकों, चिंतकों तथा देशभक्तों ने परिवर्तन के इस दौर में समाज को नयी सोच और दिशा दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 'असहयोग आन्दोलन' के दौरान पण्डित सुन्दरलाल शर्मा छत्तीसगढ़ से जेल जाने वाले व्यक्तियों में प्रमुख थे। पंडित सुंदरलाल शर्मा का निधन 28 सितंबर 1940 में हुआ था
डॉ. खूबचंद बघेल
खूबचंद बघेल का जन्म 19 जुलाई 1900 में रायपूर में हुआ था। इन्होंने मेडिकल की शिक्षा ली थी। बेघल गांधी की विचारधारा से बहुत अधिक प्रभावित थे। उन्होंने भारत की स्वतंत्रता में योगदान देने के लिए 1930 में अपनी डॉक्टर की नौकरी छोड़ दी और गांधी के आंदोलन में हिस्सा लेना शुरू किया। 1942 में बेघल ने भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया। जिसके लिए उन्हे जेल भी जाना पड़ा। वह शुरूआत में कांग्रेस के सदस्य थें लेकिन 1951 में उन्होंने कांग्रेस को छोड़ा और किसान मजदुर प्रजा पार्टी में शामिल हुए। डॉ. बघेल ने कुप्रथा का जमकर विरोध किया। खूबचंद बघेल की मृत्यु 22 फरवरी 1969 को दिल्ली में हुयी थी।
बैरिस्टर छेदीलाल
बैरिस्टर छेदीलाल (Barrister Chhedilal) का जन्म 1887 में अकलतरा (बिलासपुर) में हुआ। इंग्लैण्ड के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से उन्होंने अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र और इतिहास विषय लेकर बी ए. ऑनर्स की उपाधि प्राप्त की। 25 फरवरी 1932 को सविनय अवज्ञा आंदोलन के तहत बिलासपुर बैरिस्टर छेदीलाल ने धरना प्रदर्शन किया। बिलासपुर अंचल में जागृति फैलाने के लिए उन्होंने रामलीला के मंच से राष्ट्रीय रामायण का अभिनव प्रयोग किया। उन्होंने 'सेवा समिति' के माध्यम से युवकों को संगठित किया। सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1942 में 9 अगस्त को बिलासपुर में भारत छोड़ो आंदोलन के परिणामस्वरूप छेदीलाल को 3 वर्ष कैद की सजा दी गई। 1946 में कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार संविधान निर्मात्री सभा का चुनाव हुआ।स्वतंत्रता के बाद भी वे राष्ट्रीय सेवा कार्य में लगे रहे।
ठाकुर प्यारेलाल सिंह
बचपन से ही ठाकुर प्यारेलाल मेधावी, सच्चे स्वदेशप्रेमी तथा राष्ट्रीय विचारधारा से ओत-प्रोत ठाकुर प्यारेलाल सिंह का जन्म 21 दिसंबर 1891 में राजनांदगांव ज़िले के 'दैहान' नामक ग्राम हुआ था। सन 1920 में राजनांदगांव में मिल मज़दूरों ने हड़ताल की थी, जो 37 से भी अधिक दिनों तक चली थी और मिल अधिकारियों को मज़दूरों की सभी मांगें मंजूर करनी पड़ी थीं। वह हड़ताल ठाकुर प्यारेलाल के नेतृत्व में हुई थी। सन् 1920 में पहली बार महात्मा गाँधी के संपर्क में आए थे। असहयोग आन्दोलन एवं सत्याग्रह आन्दोलन में उन्होंने सक्रिय भाग लिया तथा गिरफ़्तार होकर जेल गए। सन् 1909 में जब प्यारेलाल सिर्फ़ उन्नीस वर्ष में राजनांदगांव में सरस्वती वाचनालय की स्थापना की। शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रारंभ से ही उनकी गहरी रुचि थी। सन् 1909 ई. में उन्होंने राजनांदगांव में 'सरस्वती पुस्तकालय' की स्थापना की थी, जो आन्दोलनकारियों का अड्डा बना। सन् 1936 से 1947 तक वे रायपुर नगरपालिका के तीन बार अध्यक्ष निर्वाचित होते रहे। यह स्वयंमेव एक रिकार्ड है। सन् 1945 में उन्होंने 'छत्तीसगढ़ बुनकर सहकारी संघ' की स्थापना की थी, जिसके प्रारंभिक काल में 3000 सदस्य थे। छत्तीसगढ़ राज्य आन्दोलन को इन्हीं विलीनीकृत रियासतों सहित सात ज़िलों के आधार पर मजबूती के साथ खड़ा किया। 22 अक्टूबर, 1954 को भूटान की यात्रा के समय स्वास्थ्य कारणों से ठाकुर प्यारेलाल सिंह का निधन हो गया।
Published on:
26 Jan 2023 01:30 pm
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