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दो जिलों के बीच से बहती नदी के भीमघाट में है पर्यटन की संभावना

हरियाली, नदी पर रंगीन चट्टानों से बना आकर्षक नजारा

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दो जिलों के बीच से बहती नदी के भीमघाट में है पर्यटन की संभावना

दो जिलों के बीच से बहती नदी के भीमघाट में है पर्यटन की संभावना

सिवनी. सिवनी एवं छिंदवाड़ा जिले की सीमा से लगे हुए कुरई आदिवासी अंचल के बीच से होकर दोनो ही जिलों को अलग-अलग करने वाली पेंच नदी का एक क्षेत्र ऐसा भी है, जिसे लोग भीमघाट के नाम से जानते है। सिवनी नगर से मात्र 35 किमी की दूरी पर स्थित इस पर्यटन स्थल में अनेकों संभावनाऐं है। पेंच नेशनल पार्क के एक भाग तोतलाडोह के पास जहां काला पहाड़ पूरे प्रदेश में अपनी ख्याति अर्जित किए हुए है। तो वहीं पेंच नेशनल पार्क के इस क्षेत्र में बहने वाली पेंच नदी में भूरा पत्थर लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।
यहां आने के बाद पर्यटक हरियाली के बीच पत्थरों से कलकल बहती नदी व यहां के अलग-अलग दृश्यों को अपनी आंखों में बसाकर ले जाते हैं और यहां दोबारा आना चाहते है। सिवनी से सुकतरा होते हुए बादलपार एवं बेलपेठ से रिछी मार्ग पर 3 किमी जाने के बाद 2 किमी का जंगल मार्ग है। यहां पर पेंच नदी के बीच भूरे पत्थर के बीच से इस नदी की अनेक धाराएं अलग-अलग निकलती है। जो कहीं झरना का रूप लेती है तो कहीं पत्थरों से टकराकर कल-कल करती हुई संगीत को जन्म देती है। यहां की चट्टानें पानी के बहाव के कारण अनेक स्थानों पर कुण्ड के रूप में देखी जा सकती है।
क्षेत्रीय ग्राम बेलपेठ निवासी रामकुमार रघुवंशी ने बताया कि यहां पर छिंदवाड़ा, सिवनी सहित महाराष्ट्र के लोग आते हैं और देव स्थान के समक्ष पूजन करते हैं। बादलपार निवासी बिहारी सोनी ने बताया कि यहां के जंगलों की सुंदरता देखकर लोग प्रसन्न हो जाते हैं। रंगबिरंगी चट्टाने एवं चमकते हुए पत्थर के साथ डूबते सूर्य का दृश्य सैलानियों को अपनी ओर खिंचता है। बताया कि चूंकि प्राचीनकाल में जंगलों में रहने वाले आदिवासियों को भील भी कहा जाता था और इस नदी के तट पर अनेक वर्षो से आदिवासी निवास करते थे। ऐसी मान्यता है कि कालान्तर में भील से यह क्षेत्र भीम के रूप में परिवर्तित हो गया और भील लोग इस नदी के घाट पर अपना भरण.पोषण करते थेएइसलिए इसे भीमघाट कहा जाने लगा।
भीमघाट सिवनी जिले की सीमा पर है और यहां से जुड़े हुए ग्राम रिछी की पंचायत विजयपानी जो कि कुरई जनपद सिवनी में आती है, वहीं दूसरी ओर आयुर्वेद दवा के लिये प्रसिद्ध ग्राम लालगांव, बादगांव जो कि यहां से 8 किमी दूर तथा हलाल 4 किमी दूर है। जो कि छिंदवाड़ा जिले के चौरई जनपद के अंतर्गत आता है। इसलिए दोनों जिले के लोग प्रयास करें, तो निश्चित ही यह क्षेत्र पर्यटन के क्षेत्र में राष्ट्रीय क्षितिज पर पहचान बना सकता है।
ग्रामीणों ने कराया ध्यान आकर्षित -
ग्रामीणों का कहना है कि यहां पर इन चट्टानों एवं पर्यटकों के लिए अगर विश्राम गृह बनाया जाता है तो क्षेत्रवासियों को रोजगार के अवसर मिलेंगे व एक अच्छी आय यहां से प्राप्त हो सकती है। यहां पर हाथ से बनी हुई वन संपदा की कलात्मक वस्तुऐं सैलानियों तक पहुंचाई जाए तो ग्रामवासियों को अपनी कला अन्य प्रांत तक पहुंचाकर क्षेत्र को विकास से जोडऩे में मदद मिलेगी। वनों से प्राप्त वनोपज का संग्रह कर उसे न्यूनतम दाम में उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाती है तो लोगों को अधिक से अधिक लाभ मिलेगा। जो इस क्षेत्र के विकास में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

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