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जयपुर के इस राजा की लोक देवता के रूप में होती है पूजा

राजा रजवाड़ो के समय से राजशाही धरोहरों में शामिल तालकटोरा के सामने स्थित जयपुर के पूर्व महाराजा सवाई ईश्वरी सिंह की छतरी पर आज भी नियमित पूजा अर्चना होती है।

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जयपुर. राजा रजवाड़ो के समय से राजशाही धरोहरों में शामिल तालकटोरा के सामने स्थित जयपुर के पूर्व महाराजा सवाई ईश्वरी सिंह की छतरी पर आज भी नियमित पूजा अर्चना होती है। वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार 12 दिसंबर को श्रद्धांजलि कार्यक्रम होगा। हर रविवार व गुरुवार को यहां लोकदेवता की तरह विशेष पूजा होती है और लोग ढोक लगाने आते हैं। यहां आज भी नियमित रूप से अखंड ज्योत जल रही है।

महंत रामतीर्थ पारीक ने बताया कि ईश्वरी सिंह तंत्र सम्राट के नाम से जाने जाते थे और राधागोविंददेवजी के अनन्य भक्त थे। ऐसी मान्यता है कि ईश्वरसिंह आज भी अप्रत्यक्ष रूप से गोविंददेवजी की सभी सात झाकियां करने जाते है। पारीक कहते है कि रविवार और गुरुवार को लोग यहां आकर ढोक लगाते है। यहां के बने कचे सूत के धागे से पीलिया, टाइफॉइड इत्यादि रोगों से मुक्ति मिलने की मान्यता है।

पारीक ने बताया कि छतरी की कला इतनी सुंदर है कि पर्यटक खिंचे चले आते हैं। छतरी के अंदर बेल-पत्तियां और आठ चित्र बने हुए हैं। एक चित्र महाभारत गीता से है, जिसमें स्वयं ईश्वरी सिंह का चित्र दर्शाया गया है। चित्रों के नीचे चारों खंभों के कोणों पर चार परियां बनी हैं। छतरी पर बैठने से एक अद्भुत शांति प्राप्त होती है।

सवाई जय सिंह के जेष्ठ पुत्र ईश्वरी सिंह संगीत, साहित्य, संस्कृत, ललित कला और तंत्र शास्त्र के गहरे अनुरागी राजा थे। सन 1749 ईस्वी में ईश्वरी सिंह द्वारा विजय स्तंभ के रूप में ईसरलाट (सरगासूली) बनवाई थी। जयपुर का जवाहरात उद्योग भी उन्हीं की ही देन है। चौगान स्टेडियम जहां पर तीज एवं गणगौर की सवारी का मेला भरता है, वहां पर इन्होंने मोती बुर्ज का निर्माण कराया था, जिसमें बैठ कर राज परिवार के लोग तीज व गणगौर की सवारी देखते है। अब भी तीज व गणगौर की सवारी उनकी छतरी के सामने कुछ क्षण रुक कर रवाना होती है।