सुमित और विनीता इस कहानी के मुख्य पात्र हैं, जिनकी कहानी नदी के दो किनारों की तरह। प्रेम की नदी के जरिए ये जुड़े हुए जरूर हैं लेकिन मिलते कभी नहीं है। नाटक की शुरुआत विनीता और उसे पति नवीन के बीच संवाद के साथ होती है। ‘पति नहीं बदलता है तो तुम उसके हिसाब से बदल जाओ।’ यहां से विनीता और सुमित की पिछली जिंदगी की यादों के साथ नाटक आगे बढ़ता है। दोनों स्कूल के समय से ही साथ होते हैं और यौवन के पहले चरण में प्रेम बंधन से बंध जाते हैं। किस्मत के फैसले से दोनों हार जाते हैं, दोनों की शादी कहीं और हो जाती है।
शादी के 9 साल बाद विनीता जब अपने घर आती हैं तो सुमित से मिलती है। दोनों के कदम उस ओर मुड़ जाते हैं जहां वो मिला करते थे। दोनों भाव अभिव्यक्तियों के साथ एक दुसरे से आगे भी मिलते रहने का वादा करते हैं। ‘जब भी घर आना, मिलकर जरूर जाना’, यह कहकर सुमित, विनीता को विदा देता है। ‘चंचल मन ये जीता जिसने’, ‘हम इस जीवन में भी अपना प्यार सफल ना कर पाए’, अमन अक्षर की ऐसी कविताएं सभागार में गूंजी।