मनुष्य
की समाज में जीवन शैली में भी व्यापक परिवर्तन हो गया है। पचास से सौ
साल पहले का रहन-सहन, खान-पान, पहन-पहनावा तथा जीवन-प्रंसग सब कुछ बेतहाशा
रूप से बदल गये हैं, सांस्कृतिक जीवन मूल्यों के परिवर्तन से
माता-पिता तथा संतान के मध्य भी एक दूरी का नया परिवेश बन गया है, जिससे एक
अंतराल तथा मोहभंग की सी स्थिति बनी है। माता-पिता एक सीमा तक बच्चों
से कोई सीख की बात कह पाते हैं। तत्पश्चात् वे अपने को इसके लिए तैयार
कर लेते हैं कि यदि बच्चों में लापरवाही का भाव बढ़ रहा है तो वे उसे उसके
हाल पर छोड़ दें। संतान के प्रति यह भाव कालान्तर में अत्यंत खतरनाक बन
जाता है तथा एक पूरी पीढ़ी को हम मूल्य विघटन के करीब पाते हैं, जो
उनकी उपेक्षा अथवा बदलते जीवन मूल्यों की चपेट में आ गयी है। इस नैतिक
संस्कार शिक्षा का लोप स्वमेव ही होने लगता है तथा बच्चों में अनादर,
कुसंस्कार तथा अनैतिक मान्यतायें घर करने लगती है। वे छोटे-बड़े का
गुरूजनों का तथा मानव सभ्यता का गूढ़ अर्थ न समझकर उथले भाव से इन्हें
स्वीकार करते हैं, जिससे नैतिक मूल्य नयी संस्कृति में पिसकर रह जाते हैं।