
कन्हैया लाल सेठिया
सब प्रतिबिम्ब तुम्हारे हैं!
यह दर्पण का महल कि इसमें
सब प्रतिबिम्ब तुम्हारे हैं!
खण्ड-खण्ड इन रूपों ने मिल
एक रूप परिपूर्ण किया,
भिन्न-भिन्न इन रंगों ने मिल
एकरंग अवतीर्ण किया,
लघु विराट के इस अन्वय ने
कितने प्रश्न उभारे हैं?
पर्ण-फूल-फल-शाखाओं में
एकोऽहम अभिव्यक्त हुआ,
मूल भूल कर, अचिर फूल पर
भावुक भंवरा मत्त हुआ,
लीला मान असंग रहे वे
जिनके नयन उघारे हैं!
प्रकृति-पुरुष के प्रथम मिलन का
बिना हेतु संयोग बने,
फिर अपनी ही रचना से छिप
उसके लिए वियोग बने,
भ्रम के इस परदे में तुमने
कितने रहस संवारे हैं !
प्रस्तुति-जयप्रकाश सेठिया
(कन्हैया लाल सेठिया के पुत्र)
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Published on:
29 Aug 2021 09:25 pm
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