
global warming
- निहिता जैन
पिछले तीन-चार दिन से आम आदमी दहशत में है। कारण भयावह तूफान की आशंका है। उत्तरप्रदेश व राजस्थान के कई हिस्सों में आए तूफान ने जान-माल का भारी नुकसान पहुंचाया है। सवाल यह है कि आखिर समय पर इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं की सूचना क्यों नहीं मिल पाती? लेकिन इससे भी अहम यह है कि आखिर हम प्रकृति के खिलाफ क्यों होते जा रहे हैं। क्या आंधी-तूफान आदि इस बात का नतीजा नहीं है कि हम प्रकृति के खिलाफ खड़े होते जा रहे हैं। आज विकास की अंधी दौड़ के कारण समूचा विश्व कई तरह की विपदाओ से घिरा हुआ है।
प्रकृति के साथ लगातार हो रही छेड़छाड़ के कारण वैश्विक स्तर पर पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। नतीजतन मानवीय जीवन पर संकट के बादल कई तरह से मंडराने लगे हैं। ऐसे खतरों में अनेक प्रकार की प्राकृतिक आपदाएं भी शामिल हैं। इनमें भूकंप, बाढ़, सूखा, आंधी-तूफान व असमय वर्षा के अलावा कई तरह की महामारियां ऐसी हैं, जो मानव जीवन के लिए बहुत बड़ा संकट हैं। जब भी किसी तरह की प्राकृतिक आपदा होती है। सरकारें सावचेत होती नजर आती हैं। लोगों को सतर्क रहने की मुनादी की जाती है। लेकिन यह नहीं बताया जाता कि आपदा के वक्त उनको करना क्या चाहिए? यही कारण है कि आंधी-तूफान हो या फिर बाढ़ लोग इसकी चपेट में आ ही जाते हैं।
सूचना तंत्र आधुनिक होने के बावजूद आज तक हम ऐसी पुख्ता व्यवस्था नहीं कर पाए जिसमें प्राकृतिक आपदा की समय रहते लोगों को सूचना दी जा सके। यही वजह है कि आंधी-तूफान में हजारों लोग बेघर हो जाते हैं। अब भी वक्त है। हमको समय रहते चेतना होगा। ऐसा तंत्र विकसित करना होगा जिसमें लोगों को किसी तरह की आपदा को लेकर समय से पहले सचेत किया जा सके। खास तौर से ऐसे इलाकों को चिन्हित करना होगा जहां ऐसी आपदाएं होती ही रहती हैं।
यह बात सही है कि सरकारों ने भी प्राकृतिक आपदाओं के संभावित खतरों के प्रति जागरूक करने के लिए कई प्रभावी कदम उठाए हैं और प्रशिक्षण भी युवाओं को दिया जा रहा है, परंतु इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए जन सहभागिता की अति आवश्यकता है। स्थानीय जनता के सहयोग के बिना किसी भी तरह का राहत एवं बचाव कार्य असंभव है।

Published on:
08 May 2018 05:07 pm
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