- सपना मांगलिक
निधि पति-पत्नी के बीच आपसी तकरार के बाद पति से अलग होकर हॉस्टल में रहने लगी थी। वह अपने पति से बहुत प्यार करती थी इसलिए उसे उम्मीद थी कि जल्द ही सबकुछ ठीक हो जाएगा। यही कारण था कि वो लौटकर घर भी नहीं आई। मगर हॉस्टल में अपने पति का कभी न ख़त्म होने वाला लम्बा इन्तजार करते अवसाद का शिकार अवश्य हो गयी। दूसरे केस में पत्नी के बेवजह शक, बार बार मोबाइल की लॉग डिटेल चेक करने की और बेधड़क ऑफिस में चले आने की आदत से नीरज इतना दुखी हो गया कि उसे अपनी पत्नी से तलाक की अर्जी देनी पड़ी।
एक और केस में पति द्वारा पत्नी को जरूरी खर्चों के लिए भी तरसाना, आर्थिक मोहताज बना उसपर नियंत्रण की कोशिश पत्नी को इतनी नागवार गुजरी कि तंग आकर उसने फांसी के फंदे से लटक अपने आपको जिन्दगी से स्वतंत्र कर लिया। भारती का कहना है कि उसका पति शराब के नशे में इतनी हाथापाई करता है कि अब उसके साथ एक पल भी गुजर नहीं हो सकती। वहीँ अमित की शिकायत है कि उसकी पत्नी उसे शारीरिक सुख नहीं देती जब भी वह उसके पास जाता है तो वह उसकी तुलना किसी हीरो से करने लगती है और उसके शरीर और पौरुष का मजाक उडाती है। यह सभी किसी सीरीयल या फिल्म की कहानिया नहीं हैं न ही ये सब किसी रोचक उपन्यास के पात्र हैं। वास्तव में यह सभी उदाहरण हमारे आस पास के लोगों के हैं जो दाम्पत्य जीवन में कटुता और अलगाव की स्तिथि से जूझ रहे हैं।
आज विवाह के स्तर पर स्त्री-पुरुष का मानसिक स्तर तथा मनोवेज्ञानिक स्तर का समान होना न केवल जरूरी अपितु अत्यंत आवश्यक समझा जा रहा है। इसीलिए इनदिनों प्रशासनिक अधिकारी किसी प्रशासनिक अधिकारी से, डॉक्टर-डॉक्टर से इंजीनीयर-इंजीनियर से, सीए एक सी से अर्थात एक ही जीवन स्तर और जॉब के लोग बिना जाती, धर्म, गोत्र, सम्प्रदाय की परवाह किये विवाह सम्बन्ध स्थापित कर रहे हैं। एक आध अपवाद को छोड़ दें तो इनमे से अधिकांशतया: खुश, सुखी एवं समायोजनपूर्व जीवन भी जीते देखे जाते हैं। इसके विपरीत जो लोग सिर्फ धर्म ,जाती और जन्मपत्री मिलान कर परंपरागत तरीके से विवाह बंधन में बंधते हैं उनके आपसी विचारों और दांपत्य जीवन में वैमनस्यता अक्सर देखने और सुनने को मिलती है। इसकी मुख्य वजह है उनके मानसिक स्तर का असमान होना। जो न केवल उन दोनों के बीच के रिश्ते में झगडे फसाद पैदा करता है अपितु काम आनंद में भी दूरी ला देता है। अगर आपका साथी सुन्दर है मगर उसकी सोचने और समझने की क्षमता आपसे कहीं ज्यादा पीछे है। तो आप उसके साथ किसी भी विषय पर वार्ता करने से कतराएंगे क्योंकि मानसिक स्तर कम होने की वजह से या तो वह विषय में दिलचस्पी लेगा ही नहीं या फिर उसे विषय समझ ही नहीं आएगा दोनों ही सूरत में बात भेंस के आगे बीन बजाने जैसी ही रहेगी। जिससे उपजे तनाव और झुंझलाहट में आपसी आकर्षण भी धीरे धीरे दम तोड़ने लगता है। और परिणामस्वरूप रिश्ते में रिक्तता आने लगती है ,संवाद शून्य होने लगते हैं। सुन्दरता या आकर्षक व्यक्तित्व घंटे भर के निजी क्षणों में सुख भले ही प्रदान करे मगर बाकी के तेईस घंटे तो सूरत नहीं सीरत ,व्यवहार और विचार ही काम आते हैं।
दाम्पत्य जीवन में अलगाव का एक और मुख्य कारण प्रेम विवाह भी है। होता यह है कि लोग यौन आकर्षण में फंस प्रेम करते हैं साथ जीने मरने की कसमें खाते हैं और जब यही प्रेमी जोड़े विवाह के अटूट और जिम्मेदारी भरे बंधन में बंधते हैं तो इन्हें लगने लगता है कि विवाह के बाद साथी बदल गया है या फिर उन्होंने गलत व्यक्ति को विवाह के लिए पसंद कर लिया और फिर दौर शुरू होता है एक दूसरे को कोसने और अपनी किस्मत को दोष देने का। दरअसल प्रेम और विवाह में एक बहुत बड़ा अंतर है प्रेम जहाँ पूर्ण बेवाक समर्पण होता है वहीं विवाह मर्यादा की ईंट और जिम्मेदारियों के सीमेंट से बना मजबूत घर। प्रेमी जोड़े प्रेम तो करना चाहते हैं मगर जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहते ,समाज के द्वारा निर्धारित और एक परिवार के निर्माण के लिए आवश्यक मर्यादाओं का पालन नहीं करना चाहते। बिना जिम्मेदारी निभाये अगर कोई प्रेम करे तो निस्संदेह वह उच्छंखलता होगी। दांपत्य जीवन में बढ़ती दरार की जो सबसे अहम् वजह इन दिनों मुझे नजर आ रही है वो है पुरुष की वही पुरातन सोच और स्त्रियों का रूढ़ियों को तोड़ने की तरफ उठा पहला कदम।
आज भी पुरुष चाहे कितना ही पढ़ा लिखा या हाई प्रोफाइल क्यों न हो पत्नी के रूप में उसे सीता ,सावित्री जैसी पति के कहने पर आग में कूदने वाली या रात को सोते समय पैर दवाने वाली या स्वामी स्वामी की रट लगाए आगे पीछे पति की दुत्कार सहकर भी घूमने वाली चाहिए। जब विवाह के लिए पुरुष के पास लड़कियों के प्रोफाइल या बायो डेटा आते हैं तो वह उच्चशिक्षित और कमाऊ बीवी को प्राथमिकता देता है मगर विवाह के बाद उससे उम्मीद गाँव की घूँघट ओढ़े ,चूल्हा फूंकती और गोबर लीपती बीवी की तरह रहने और काम करने की करता है। खासकर जब वही उच्चशिक्षित पत्नी अपनी शिक्षा का सही उपयोग करना चाहे तो पति का अहम उसे स्वीकार नहीं करता। यह आमतौर पर देखा गया है कि घर से बाहर निकल काम करने वाली औरतों के पति ईर्ष्यालु और शक्की अधिक पाए जाते हैं। उसी तरह आज की स्त्री भी पढी लिखी होने की वजह से घर के जरूरी कार्यों को करने में झिझकती है और घर संभालने से बेहतर किटी पार्टी और क्लब के द्वारा सामाजिक दायरा बढाने या नौकरी कर आत्मनिर्भर बनने के प्रयास ज्यादा करती हैं जिससे नौकरों के भरोसे चलने वाले परिवार घर और बच्चे सभी उपेक्षा का शिकार होते हैं। और घर में तनाव के बीज फूटने लगते हैं। दांपत्य जीवन में दूरियों की एक मुख्य वजह यौन असंतुष्टता भी है। जब टीवी ,सिनेमा ,और स्मार्ट फोन नहीं थे तब आपसी मनोरंजन और ऊब दूर करने के लिए पति पत्नी एक दूसरे के नजदीक आते थे। मगर मनोरंजन के बढ़ते साधनों, सुख सुविधाओं और सामाजिक दायरे के फैलाव ने पति पत्नी की एक दूसरे पर निर्भरता कम कर दी है। सुखद दांपत्य जीवन में सेक्स लाइफ का अहम योगदान होता है।
सुखद दांपत्य के लिए जरूरी है कि आपकी सेक्स लाईफ भी अच्छी हो। सेक्स में आई नीरसता दांपत्य संबंधों की ताजगी को खत्म कर देती है। शारीरिक संबंधो में आया तनाव तलाक तक पहुंच जाता है। शारीरिक संबंध को लेकर आपस में संतुष्ट न होना बारबार घर में कलह और अलगाव की वजह बन जाता है। यदि पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंधों में आपसी तालमेल न हो तो दोनों का साथ-साथ चलना मुश्किल हो जाता है। पति दूसरी औरत से संबंध तभी बनाता है जब उसे अपनी पत्नी का साथ नहीं मिलता है। जब पत्नियां सेक्स में पति को सहयोग नहीं करती तो पति बाहर अन्य महिलाओं से संबंध बनाने से नहीं चूकते।
सेक्स पति-पत्नी के जीवन की अमूल्य निधि है। कामभावना पुष्ट शरीर की अपेक्षा नहीं रखती। इस में महत्वपूर्ण भूमिका है कामकला की, जो पति-पत्नी इस कला में निपुण होते हैं, वही एकदूसरे को पूर्ण संतुष्ट कर सकते हैं। मगर पति पत्नी इसे अपनी बात मनवाने का और अपने साथी को नीचा दिखाने या तड़पाने का जरिया बनाकर इन सुख के लम्हों में कड़वाहट घोल देते हैं। जीवन में आपसी सहयोग व समायोजन के आभाव के कारण अलगाव के केस ज्यादा दिख रहे हैं। इनमें उन दंपतियों को अपने जीवन में सबसे अधिक समस्याएं आ रही हैं। जिनके आयु वर्ग में अधिक अनुपात होता है। उन्हें एक-दूसरे को समझने में काफी दिक्कतें आती हैं। इसके अलावा शिक्षा, आर्थिक स्थिति व एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर भी इनके रिश्तों में अलगाव पैदा करने का प्रमुख कारण है।
बेवफाई और शक पति-पत्नी के रिश्तों की डोर को कमजोर कर रहा है। शादी के मंडप में जन्मभर का साथ निभाने की कसमें खाने वाले युगलों के रिश्ते बेवफाई व शक की कसौटी पर आकर दम तोड़ रहे हैं। पति-पत्नी का नौकरीपेशा होना, एक-दूसरे के लिए समय न होना इनके दांपत्य जीवन में न सिर्फ दरार पैदा कर रहा है।बल्कि उससे स्थिति इतनी विकट हो रही है कि मामला तलाक तक पहुंच रहा है। अधिकतर मामलों में पति-पत्नी एक साथ सिर्फ इसलिए नहीं रहना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें एक-दूसरे पर शक है कि उनका पार्टनर उनसे बेवफाई कर रहा है।नौकरीपेशा या कामकाजी पती-पत्नी को एक-दूसरे पर शक है। कुछ मामलों में यह शक सही भी निकलता है। लेकिन अधिकतर मामलों में शक बेबुनियाद ही होता है जो अलगाव की वजह बनता है।कुछ मामलों में घरेलु हिंसा भी अलगाव की एक बड़ी वजह बन जाती है यह हिंसा आर्थिक, सामाजिक , भावनात्मक और शारीरिक भी हो सकती है। कई बार पति-पत्नी दोनों को ही पता नहीं रहता कि वह अपने साथी के साथ घरेलु हिंसात्मक व्यवहार कर रहे हैं जैसे पति का पत्नी को हाथ खर्च न देना ,पत्नी का पति को निजी क्षणों में खरी खोटी सुना उसके पौरुष को ललकारना, आपसी हाथापाई, और समाज में और रिश्तेदारों में अपने साथी की बुराई करना या दुष्प्रचारित करना इत्यादि आते हैं। पति-पत्नी दोनों का नौकरी पेशा होना, एकल परिवार, एक-दूसरे के लिए समय न होना भी एक अहम कारण है रिश्तों की डोर का कमजोर होने का। इससे कई बार मिस-अंडरस्टैंडिंग हो जाती है। ऐसे में आपसी बातचीत से मनमुटाव को दूर कर दांपत्य जीवन को नई दिशा देने की पहल की जानी जरूरी है। जरूरत है बस थोड़ी सी समझदारी और व्यर्थ के अहम् को दूर कर पहल करने की। कई बार झगडे और मन मुटाव इसलिए भी बढ़ जाते हैं कि वह उन्हें दूर करने की स्वंय कोशिश न कर अपने साथी की पहल का इन्तजार करते हैं।
पति पत्नी एक गाडी के दो पहिये है। सदियों से दो विपरीत लिंगीय असमान व्यक्तित्व के लोग साथ रहकर एक परिवार का निर्माण करते आये हैं आखिर क्यूँ ? हमें समझने की आवश्यकता है कि विवाह स्त्री पुरुष का ही क्यों किया जाता है स्त्री स्त्री या पुरुष पुरुष के विवाह की व्यवस्था हमारे समाज में क्यों नहीं ? तो इसका सीधा साधा सा जवाब यह है कि जैसे चुम्बक के दो विपरीत ध्रुब एक दूसरे को आकर्षित करते हैं ठीक वैसे ही दो विपरीत क्षमता और शारीरिक बनावट के लोग भी एक दूसरे को आकर्षित करते हैं यह कुदरत का बनाया नियम है जैसे प्रकृति स्त्री और परमात्मा पुरुष है और दोनों के संयोग से ही इस सृष्टि का जन्म होता है। सृजन के लिए दो विपरीत सत्ता का मेल होना जरूरी है दो एक सामान तत्वों से सृजन नहीं हो सकता है।
स्त्री स्त्री और पुरुष पुरुष कभी नव सृजन कर सृष्टि के कार्य को सुचारू रूप से आगे बढाने में योगदान नहीं दे सकते। इसके लिए स्त्री और पुरुष को ही मिलना होगा। और एक बात जो गौर करने लायक है वह है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। या यूँ भी कह सकते हैं कि सृजन के लिए त्याग जरूरी है। जैसे माँ को अपने बच्चे को दुनिया में लाने के लिए उसे अपनी कोख से अपने शरीर से निकलना ही पड़ता है। एक लेखक को सृजन के लिए अपने विचारों को कागज़ पर उत्सर्जित करना ही पड़ता है। महिलाओं में होने वाला मासिक भी इसी प्रक्रिया का एक उदाहरण है। ठीक इसी तरह पति –पत्नी को भी अपने दांपत्य जीवन को सुचारू रूप से चलाने और एक सुखी परिवार का निर्माण करने के लिए अहम् को त्यागना पड़ता है। आपसी समर्पण और त्याग बस यही दाम्पत्य जीवन की रीढ़ है जो दांपत्य जीवन को सुद्रढ़ रखती है।
(लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार हैं)