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तुलसीदास के साहित्य में अर्थनीति 

विषमता रहित अर्थ नीति आज की जरुरत 

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Pawan Kumar Rana

Aug 25, 2016

this book, gives, the answer, of  every question,

tulsidas

- डाॅ. नीतू सोनी

प्रत्येक क्रान्तदर्शी, महाकवि अपने युग का ज्ञापक तथा कर्णधार होता हैं। युगीन वातावरण के कारण उद्वेलित अनुभूति का अतीत के पारम्परिक नैसर्गिक मानदण्ड के साथ तालमेल बिठाकर भावी हित की कल्पना से साहित्य-सर्जन उसका धर्म हो जाता है। भाव-भूमि के स्तर पर उसका निज हित लोकहित में परिणत हो जाना भी स्वाभाविक होता है। प तुलसीदास इसके अपवाद नहीं हैं। पार्थविकता के इस अतिवाद के फलस्वरूप मानव-जाति के दैन्य, दुःख और क्लेश का अपहरण करने के लक्ष्य से तुलसीदास का उद्वेलित भावुक मन इतिहास और कला का सहारा लेकर शास्त्र-पारगमिता बुद्धि को साधन बनाकर च्स्वान्तः सुखाय के ब्याज से वास्तविक शाश्वत् सत्य पर आधारित लोक-हित के लिए आकुल हो उठा। जो आपकी साहित्यिक रचनाओं में दृष्टिगोचर होता है . च्बहुभाषा विज्ञ डाॅ. ग्रियर्सन ने इंडियन ऐंटिक्वेरी में तुलसीदास को आधुनिक काल का सर्वोंत्तम ग्रन्थकार घोषित करते हुए, भारत के नैतिक तथा धार्मिक आचरण का आधार तुलसी साहित्य को बताया है। तुलसी रामायण को इंग्लैंड में बाइबिल की अपेक्षा अधिक महत्त्व दिया है। च्च्गोस्वामी तुलसीदास की रचना जन-समाज के लिए सैद्धान्तिक दृष्टि से इतनी अनुकूल हैं कि उनके वचनों का जनता कहावतों की तरह इस्तेमाल करती है। वर्तमान समय में हिन्दु समाज के अन्दर उनके उपदेशों का जो प्रभाव है, वह अन्य किसी का नही। अन्य साम्प्रदायिक साधुओं की तरह उन्होंने अपना निज का कोई सम्प्रदाय नहीं चलाया, तथापि उनको भारत की तमाम हिन्दु जनता चरित्र-निर्माण तथा धार्मिक कार्यो में एक बहुत ही आप्त और प्रमाणित पथ प्रदर्शक मानती है।च्च् तुलसी एक समन्वयवादी कवि थे। उनका कविरूप उनके धार्मिक तथा सामाजिक, आर्थिक दृष्टिकोण को व्यक्त करने का साधन मात्र है, उनका प्रमुख ध्येय नहीं। तुलसी की प्रगतिशीलता तथा क्रान्तिदर्शित्व ही ऐसे गुण थे, जिनसे वे उन परिस्थितियों के अनुकूल नवीन दृष्टिकोण अपनाकर, धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक क्षेत्रों के आधार पर अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त कर सकें। चूंकि पुरातन शास्त्रों में जहाँ मानव-जीवन का लक्ष्य चतुवर्ग फल प्राप्ति माना गया है। इसमें भी लौकिक अभ्युदय-पूर्वक व्यवहार-कुशलता की प्राप्ति के लिए च्अर्थच् नामक लक्ष्य को विशेष महत्त्व दिया गया है। च्च्अर्थ एक ऐसा साधन है जिसके अभाव में अथवा अतिरेक में दोनों अवस्था में मानव-जीवन की अवस्था असन्तुलित हो जाती है। अतएव लौकिक एवं पारमार्थिक दोनों प्रकार के कल्याणार्थ, एवं अर्थाजन,, अर्थवृद्धि तथा अर्थनिक्षेप के विषय में आर्थिक नीति को समाविष्ट किया है। धन का महत्त्व, तज्जनित सुख-दुःख, प्राप्ति के उपाय, समाज में अर्थसन्त्तुलनार्थ, निर्दिष्ट-विधान आद सभी इसी नीति के अन्तर्गत आते है। च्च्तुलसी उस अर्थनीति के समर्थक थे जिसमें विषमता का अभाव हो, साम्यता का प्रसार हो, शोषण की भावना का परित्याग तथा पोषण की भावना का सद्भाव रहे। तुलसी की अर्थनीति में मानवतावादी उदात्त दृष्टिकोण की व्याप्ति के कारण ईष्र्या और तृष्णा का स्थान संतोष तथा त्याग ने ले लिया था। इसमें वैध-अर्थ, आदर्श-अर्थव्यवस्था, अर्थवैषम्य, अर्थागम, अर्थसंग्रह, अर्थन्यास, पांच-प्रकार का अर्थ-विभाजन, अर्थनीति का सर्वोत्कृष्ट गुण, समाज में अर्थ संतुलन, पंच-महायज्ञ, स्त्री शुल्क, दान का महत्त्व, इत्यादि को सम्मिलित किया गया है।च्च् सन्ताशिरोमणी गोस्वामी तुलसीदास का युग वैभव, ऐश्वर्य एवं विलास का युग था। उस समय आर्थिक व्यवस्था के दृष्टिकोण से दो वर्ग थे- एक वैभव शाली शासक वर्ग जिसमें मुसलमान व हिन्दु दोनों ही जातियों के सत्ताधारी लोग शामिल थे।
गोस्वामी तुलसीदास के समय में यवन शासकों का साम्राज्य था, इनकी संकीर्ण भावना तथा अर्थ लिप्सा से भारतीय अर्थनीति का मूलाधार उपकार्य-उपकारक भाव तथा प्रेम-सूत्र का तो लोप हो चला था, भूमिपति स्वयं धनापहारक बन गये थे। धनाढ्य को आततायी की संज्ञा दी है।जिनके अत्याचारों का वर्णन तुलसी ने इस प्रकार किया है -

च्च्वेद-धर्म दूरि गए, भूमि चोर भूप भए
साधु सीध मान जानि रीति पापपीन की।
दूवरे को दूसरों न द्वार, राम दया धाम,
रावरी ऐ गति बल-विभव विहिन की।।

तुलसीदास जी के काव्यों के अनुसार राम-राज्यकाल में प्रजा का आर्थिक-स्तर अत्यन्त उच्च तथा उदात्त भावनाओं पर आधारित था, जिसमें प्रजा के कर प्रदान करने की तो बात ही नही थी, अपितु सदाचरण-सम्पन्न राजा के सद्व्यवहारों के कारण अपना सर्वस्व तक होम करने को सदैव लालायित रहती थी। राम-राज्य मे आर्थिक-असंतुलन का अभाव था, घर-घर की आर्थिक-स्थिति अत्यन्त-सम्पन्न तथा सौजन्य पूर्ण थी -

नहि दरिद्र कोड दुखी न दीना।
नहिं कोड अबुध न लच्छन होना।
सब निर्दभ धर्मरत पुनी, नर अरू नारि चतुर सब गुनी।
सब गुनग्य पण्डित सबग्यानी, सब कृत्ग्य नहिं कपट सयानी।
राम-राजकर सुख सम्पदा, बरानि न सकइ फनीस सारदा।
सब उदार सब पर उपकारी, विप्र चरन सेवक नर-नारी।

निष्कर्ष रूप से कह सकते है कि तुलसीदास ने कुत्सित अर्थनीति के परिणाम-स्वरूप जनता का क्षयग्रस्त तथा दुःखी जीवन देखकर स्वार्थपूर्ण ऐहिक विषय परक अर्थनीति के स्थान पर समष्टिपरक मानववादी विशाल अर्थनीति का सूत्रपात किया। जिसका आधार प्राचीन आध्यात्मिक चेतना तथा सर्वभूमिहतेरतः की उदात भावना थी। तुलसी साहित्य के अनुसार अर्थनीति का उत्तम सिद्धान्त यह है कि परार्थ ही अपना स्वार्थ माना जाए जबकि मध्यम सिद्धान्त यह होता है कि स्वार्थ के अविरोध से परार्थ को अपनाया जाये। इन्हीं दोनों के प्रतिक है क्रमशः राम तथा प्रतापभानु। तुलसी इस सिद्धान्त के नितान्त विरोधी है कि दूसरे को हानि पहुंचाकर अपनी स्वार्थ भावना की जाए। इसे वे अर्थनीति मे आसुरी प्रकृति मानते है, जिससे संघर्ष और विनाश नितान्त ध्रुव है।

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