
youth agitation
एक तड़क-भड़क से, आक्रोश से, असंतोष भरी हुई दुनिया बदल डालने की सोच हम युवाओं को किस कदर अपने गिरफ्त में ले लेती है यह 'मुझे 1084 की मां' मूवी देखने के बाद समझ में आया। स्वर्गीय महाश्वेता देवी जी ने बड़ी ही खूबसूरती से अपनी किताब में नक्सलवाद को अपनाने वाले युवाओं के बारे में लिखा है, जिसमें पढ़े-लिखे युवा अपने साथ और कई लोगों की जिंदगियों को किस कदर प्रभावित कर देते हैं, गरीबों और अमीरों के बीच की खाई को पाटने की कोशिश में युवा एक गलत रास्ते पर निकल जाते हैं।
मार्क्सवादी और कम्युनिस्ट विचारधाराएं इस कदर हमारे जेहन को प्रभावित कर देती हैं कि हम बस एक पल में दुनिया बदल देना चाहते हैं। हम कार्ल मार्क्स और लेलिन, गैरीबाल्डी के स्वतंत्रता प्राप्त करने के तरीकों से प्रभावित हो जाते हैं, लेकिन उनके संघर्षों के सही मर्म को समझाने में सर्वथा असफल रहते हैं।
आजकल युवाओ में अंसतोष, आक्रोश बर्दाश्त करने की क्षमता कम होती जा रही है, जरा-सी परेशानी उन्हें उग्र और हिंसक बना देती है, वो दुनिया को पूरी तरह बदल देना कहते हैं लेकिन अपनी गलतियां स्वीकार करके और उनसे सीखकर आगे बढ़ने की क्षमता ख़त्म हो गई है। उनमें सुसाइड करने की आदत में लगातार वृद्धि होती जा रही है, एक से एक मेघावी युवा जो देश का भविष्य हो सकते हैं, जरा-सी आलोचना से डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं।
सभी को सफलता चाहिए, नाम-शोहरत चाहिए लेकिन कोई भी जीवन संघर्ष के लिए तैयार नहीं है, कोई भी उन संघर्षों से सीखकर आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं रखता है। सभी बस दूसरों की सफलता देखकर जल-भुन कर राख होने में, बदले की भावना रखने में ज्यादा गर्वित महसूस करते हैं। बशर्ते यह समझने के कि सफल होने वाले ने कितना और किस तरह का संघर्ष किया था, जो आज उसकी मिसालें हमें दी जाती हैं।
यही युवा दहेज़ हत्या, यौन उत्पीड़न जैसे घृणित अपराधों को रोकने के बजाय उसमें अपनी सहभागिता देने में जरा भी हिचकिचाहट महसूस नहीं करते हैं। भीड़ में हो रही हत्या नहीं रोकते हैं, बल्कि उसको तमाशबीन बनकर देखते हैं और तकनीक का गलत उपयोग करके वीडियो बनाने में व्यस्त रहते हैं। युवा देश और दुनिया तो बदल देना चाहते हैं, लेकिन अपने आसपास हो रही गलत घटनाओं को क्यों नहीं रोकते हैं?
जेएनयू और बीएचयू में हुए छात्र आंदोलन उनके आक्रोश को दिखाते हैं, उनके असंतोष को दिखाते हैं, लेकिन एक अच्छी यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले युवा जो काफी मेहतन के बाद यहाँ पहुंचते हैं, उनमें इतना आक्रोश असंतोष क्यों? क्या वह सभी देश की राजनीति से ज्यादा प्रेरित हैं, जिसमें से कई राजनीतिज्ञ छात्र आंदोलनों से देश की राजनीति में आए हैं, या वजह कुछ और है?
छात्र आंदोलन कोई नई घटना की तरह नहीं है, भारत के साथ कई और देशों में छात्र आंदोलन होते रहे हैं और आंदोलनों ने उन देशों की राजनीति और सरकारों को बदल कर रख दिया है। इन्ही छात्र आंदोलनों से कई आतंकवादी भी निकले हैं, जिनमें से कई तो बेहतर शैक्षणिक पृष्ठभूमि और कुशाग्र बुद्धि के रहे हैं, लेकिन थोड़े से असंतोष और आक्रोश ने उनकी दिशा और जिंदगी को ही परिवर्तित कर दिया, जिन्हें डिग्री हासिल करके अच्छी नौकरी में जाना था, एक बेहतर नागरिक बनना था, अपने देश का भविष्य तय करना था, वो खुद अपनी ही दिशा से भटक गए। कुछ जोश से भरे भाषणों ने उनके गर्म उबलते रक्त और विचारों की दिशा ही परिवर्तित कर दी। उन्हें हिंसा के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित कर दिया।
आज मुद्दा यह नहीं हैं कि किसी ने युवाओ को हिंसा का रास्ता ही सही बताकर उन्हें उसी रास्ते पर चलने को मजबूर कर दिया, वरन मुद्दा यह है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर है जो युवाओं को सिर्फ डिग्रियां देती है ताकि वे पढ़े-लिखे होने का ठप्पा बस लगा सकें। कई लोग एक से ज्यादा बार मास्टर्स, एमफिल, पीएचडी की डिग्रियां हासिल करते हैं, लेकिन वही लोग सबसे पहले गलत रास्ते अख़्तियार कर लेते हैं। यह हमारी शैक्षिक व्यवस्था में कमी की ओर इशारा करती है, जो हमें बस जॉब पाने के लिए डिग्रियां लेने के लिए प्रेरित करती है, न कि एक बेहतर इंसान बनने की शिक्षा देती है।
हमारी शैक्षिक व्यवस्था सिर्फ नौकरी पाने की सक्षमता हासिल करने के अनुरूप ही है, न कि एक ऐसा इंसान बनाने की क्षमता विकसित करने की जिसमें अपने अच्छे-बुरे के साथ देश और समाज के भविष्य के बारे में चिंतन करने की क्षमता वाली सोच और व्यक्तित्व हो।
शिक्षा हमें ज्ञान के साथ खुद की सोच को परिपक्व और विकसित करने में भी सहायक होती है। जब कोई व्यक्ति एक या कई और विषयों की पढ़ाई करता है तो उसे कई क्षेत्रों का ज्ञान हासिल होता है, जो उसके व्यक्तित्व को परिपक्वता देता है। सोच को नई दिशा मिलती है, उसे अच्छे-बुरे, गलत-सही में भेद करना आता है। यही शिक्षा हासिल करने का सही मायनों में अर्थ होता है।
शिक्षा तभी सार्थक होती है, जब उस ज्ञान का उपयोग सही मकसद के लिए किया जाता है। बड़ी डिग्रियां हासिल करने के बाद भी अगर हम गलत रास्तों को अख़्तियार करते हैं, समाज को एक नई दिशा देने की जगह खुद भटक जाते हैं, अपनी सोच के दायरे को कुएं के मेढ़क की तरह अपरिपक्व रखते हैं, तब शिक्षा के नाम लाखों रुपये खर्च करके हासिल की गई डिग्रियों की कीमत नगण्य होती है।
- विरासनी बघेल
(ब्लॉग से साभार)
Published on:
22 May 2018 04:31 pm
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