
Chrysanthemum
फूलों की दुनिया निराली है, जितने रंग प्रकृति ने इसे दिए हैं, सम्भवत: इतने और किसी को नहीं मिले हैं। यही वजह रही है कि फूल अपने इसी रंग-रंगीलेपन से प्रारम्भ से ही मानव मन का चहेता रहा है। इसके अलावा फूलों की महक उसका रूप व आकार भी इन्हें जनप्रिय बनाने में अग्रणी रहे हैं। फूलों की रानी गुलदाऊदी भी ऐसे चटख-मनोहारी रंगों का पुष्प है जो पूरे विश्व में चौदह हजार से भी अधिक जातियों में अपने कुल के एक हजार सदस्यों के साथ पाया जाता है। गुलदाऊदी की ज्यादातर जातियाँ शाक के अन्तर्गत आती हैं और वार्षिक तथा बहुवार्षिक दोनों तरह से पाई जाती हैं। सम्भवत: यह जितना विविध रूपी व रंगीला है, उतना शायद ही कोई फूल यह सौभाग्य प्राप्त कर सका हो।
गुलदाऊदी है क्या ?
वैसे गुलदाऊदी (क्राइसेन्थीमम) एक पुष्प समूह के अन्तर्गत मुण्डक तथा हैड दो नामों से पाए जाते हैं। बीसियों पुष्प इस प्रजाति में दो भागों में भी लगते हैं। चपटे-चटकीले रंगों वाले रे-फ्रोक्लेट या लिगूलेट पुष्प बाहर की ओर खिले होते हैं, जबकि दूसरे फूल बीच में एक खास तरह का ***** बनाते हैं। अत: हम इन्हें डिस्कफ्लोरेट अथवा नलिकाकार फूलोंके नाम से जान सकते हैं। इनके लिगूलेट फूल एकलिंगी तथा नलिकाकार फूल उभयलिंगी होते हैं। नलिकाकार पुष्प नर व मादा दोनों तरह के होते हैं। वैसे यह विश्वव्यापी पुष्प है, परन्तु कई सौ वर्ष पूर्व यह फूल जापान व चीन में उगाए जाने का प्रारम्भिक इतिहास केरोलस लिनियस (१७५३) के वर्गीय विश्लेषण में मिलता है। डेजी के फूल के आकार में १७६४ में पहला फूल चीन की एक पुष्पवाटिका में इसे पहचाना गया तथा इसे क्राइसेन्थीमम इण्डीकम नाम दिया गया।
१६८९ में हालैण्ड में यह पुष्प एन्थीमीस आर्टिमिसीकोलिया नाम पा गया तथा इसके करीब ७५ वर्ष बाद ब्रिटेन में फिलीपमिलर नामक बागवान ने इसका एक सूखा फूल रायल सोसायटी को भेजा, इसी का नाम क्राइसेन्थीमम पड़ा। यह नमूना आज भी ब्रिटीश म्यूजियम में आरक्षित है। इसके बाद भी इस फूल को लेकर शोध होता रहा तथा यह विविध नाम पाता रहा तथा विश्व में इसकी अनेक जातियाँ विकसित होती रहीं। परन्तु जापान के लोगों ने इसकी सर्वश्रेष्ठ आधुनिक युग में प्रचलित प्रजाति का विकास किया और इस मामले में चीन भी पीछे रह गया। जापान का तो यह राष्ट्रीय फूल बना, जब इसे गोल्डन फूल के रूप में राजकीय सम्मान के उपयोग में लाया जाने लगा तथा बड़े-बड़े पदों पर विद्यमान व्यक्तियों को यह भेंट किया जाने लगा।
गुलदाऊदी के प्रकार
वर्तमान युग में यह 'क्राइसेन्थीमम पोरिफोलियम’ नाम से जानी जाती है। आज वह इतने रूपों, आकारों तथा रंगों में विकसित हो चुकी है कि एक इंच से बारह इंच तक के व्यास में यह शोभायमान है। सारे रंगों के बावजूद गुलदाऊदी को वर्तमान में नीला रंग नसीब नहीं है, परन्तु यह विश्वास है कि १८वीं सदी में यह फूल नीले रंग में जापान में था। परन्तु इस रंग को विकसित न किए जाने से यह लुप्त हो गया। वैसे जापान में काकरी तथा बर्तनों पर आज भी नीले रंग में इसे माण्डा जाता है। आज भी वनस्पति विशेषज्ञ इस दिशा में सक्रिय हैं तथा नीले रंग को विकसित करने की दिशा में व्यावहारिक रूप से शोध कर रहे हैं।
गुलदाऊदी वार्षिक व बहु वार्षिक दो प्रकारों में प्रचलित है। वार्षिक रूप से लगने वाले पौधे बार-बार बीज की सहायता से उगाए जाते हैं तथा उन्हें क्राइसेन्थीमम सेजीटम नाम से जाना जाता है। ये फूल सामान्य रूप-रंग की बनावट में पौधे पर लगते हैं। इस पौधे को किसी की जरूरत नहीं होती। यह स्वयं अपने आप में शक्तिशाली होता है। इनमें बीज बनता है। अत: ये पुन: उग आते हैं। यह जनवरी से मार्च तक खिलते हैं। जबकि बहुवार्षिक पौधों की जड़ तो जीम रहती है, परन्तु इन्हें कलम करना होता है तथा ये लगभग छ: इंच की ऊँचाई से काट दिए जाते हैं। फिर नीचे धरती में ये जड़वे निकालने लगते हैं। जनवरी तक ये पूर्ण रूप से विकसित होकर तैयार हो जाते हैं।
वैसे इस फूल के जड़वे जुलाई तक गमलों में ही रहते हैं। परन्तु मानसून के साथ ही इन्हें काटकर अलग कर दिया जाता है तथा फिर ये अलग गमलों में बनने लगते हैं तथा मौसम के आने पर ये जड़वे फूल देने लगते हैं। परन्तु इसकी अपनी सावधानियाँ अवश्य हैं, वह यह कि उसे स्वस्थ बनाने के लिए खाद्य दिया गया या नहीं, उसकी पत्तियाँ हटाई या नहीं। फूल बड़ा लेना है तो अन्य तमाम कलियों को हटाकर एक ही कली पौधे पर छोड़ी जाए ताकि वह विकसित होकर पूर्ण रूप से खिलकर बड़े आकार में मिल सके। इस किस्म में कलियाँ चटकने पर सहारे की जरूरत होती है।
इसलिए कोई पतली मजबूत लकड़ी के सहारे रूप में रोपी जानी चाहिए। दिसम्बर में ये फूल पूरी तरह खिलकर तैयार हो जाते हैं। भाँति-भाँति के फूल चूँकि गुलदाऊदी फूलों की रानी है। अत: यह नाम उसे यूँ ही नहीं दिया गया। उसकी विविधता तथा मनोरमा रंग-रंगीली आभा ने ही उसे यह पद प्रदान किया है। गुलदाऊदी की बीसियों किस्में हैं। इनमें से मुख्य का हम यहाँ विश्लेषण करते हैं तथा पाते हैं कि किस प्रकार यह फूल फूलों की रानी बन सका है। बोनी गुलदाऊदी किस्म वर्तमान में सर्वाधिक रूप से प्रचलित है तथा गमलों में ही इसके छोटे-छोटे पौधे फूल देते हैं।
फोसफोन या बी-९ नामक रसायन मिट्टी में मिलाकर दिए जाने से यह पौधा ज्यादा बढ़ता नहीं और बहुत ही छोटी लम्बाई में रहकर फूल खिलाने लगता है। सदाबहार गुलदाऊदी फूल पूरे वर्ष फूल देते हैं। इसके लिए दिन के प्रकाश की अवधि को बढ़कर फूलोंको सदैव प्राणवान रखा जाता है। इसके लिए बल्ब या फलोरोसेंट लेम्प का प्रयोग किया जा सकता है। दूसरी सदाबहार किस्मों के विकास के लिए रासायनिक दवाओं की मदद से दो-तीन बार के छिड़काव से गमलों में ही फूल प्राप्त कर लिए जाते हैं। इस मध्य मौसम खुश्क होना चाहिए।
चार्म गुलदाऊदी के फूल बहुत ही भव्य व मनमोहक होते हैं। इस पौधे में हजारों की संख्या में फूल खिलते हैं तथा हल्की सुगन्ध भी इसमें पाई जाती है। इनमें गुलाबी, पीले, सुर्खलाल तथा लाल व सफेद रंग पाऐ जाते हैं।
केसकेड गुलदाऊदी का प्रचलन पहले चीन व जापान में ज्यादा था। १९३० के बाद से यह शनै: शनै: पूरे विश्व में छा गई। इसके फूल पौधे में पेण्डुलम की तरह लटकते हैं तथा संख्या में भी ज्यादा आते हैं। इनके अतिरिक्त भी गुलदाऊदी सिंगल, सेमीडबल, डेकोरेटिव, स्टीलैट, पोपपोन, हरेगूलर, क्विल्ड, रिफ्लेक्सड, इनकवर्ड, इन्टरमीडियेट, इनकरविंग, बाल, बटन, सिंगल कोरियन, डबल कोरियन, चार्म पासिनेरिया, एनीपोन, स्पून, रेयोनेट्स तथा सेमीक्विल्ड अन्य मुख्य रूपों में पाऐ जाते हैं।
देखभाल
यह तो सर्वविदित है कि बिना देखभाल के तथा खाना-खुराक के कोई भी वनस्पति फलर्-ीू नहीं सकती। गुलदाऊदी को भी यही मर्ज है, वह अच्छी देखभाल तथा खाद खाना पसन्द करती है जो उसे स्वस्थ बनाए रखे। वह उन रोगाणुओं से भी बचना चाहती है, जो उसके पौधे में लगकर उसे नष्ट करते हैं अथवा फूलों में आभा नहीं आने देते। खाद रूप में पत्तियों की सड़ी हुई, खाद, नाइट्रोजन, फॉसफोरस तथा पोटाश की जरूरत होती है, इस पौधे को। इससे फूल को द्विगुणित आभा मिलती है, वहीं वह मजबूत तथा आकार में बड़े फूल दे पाता है। क्योंकि विविध रसायनों के पौधे के लिए विविध उपयोग हैं, इस दृष्टि से पौधे से रंगीले फूल प्राप्त करने के लिए खाना-खुराक तथा खाद दिया जाना अपेक्षित है।
बीमारियाँ व कीटाणु
जहाँ तक गुलदाऊदी में लगने वाली बीमारियों का सवाल है, इसके लिए यदि अच्छी खाद व स्वस्थ पानी व वातावरण प्रदान किया जाए तो इनसे बचा जा सकता है। वैसे मुख्य रूप से इस पौधे को क्राइसेन्थीमम रस्ट, बोटराइट्रिस, क्राउन गाल व पाउडरी मिलड्यू नामक बीमारियाँ होती हैं। इसके अतिरिक्त कुछ कीड़े ऐसे हैं, जो इस पर हमला बोलकर इसे नष्ट करने की योजना भी बनाते हैं। इसे लगने वाले कीड़ों में एफीड्स, केपसीड बग व क्राइसेन्थीमम लिफमाइनर प्रमुख हैं। इनसे भी बचने के लिए अनेक रसायन खोज लिए गए हैं, जिनके स्प्रे से इन घातक कीड़ों तथा रोगों से फूलोंकी महारानी को बचाया जा सकता है।
फूल इस युग की सजावट का महत्त्वपूर्ण अंग बनता जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में हम फूलोंकी रानी गुलदाऊदी को पृथक् नहीं कर सकते। फागुन में खिलने वाले प्रकृति के विविधंरगी फूलों तक गुलदाऊदी चलते ही हैं। इसके अलावा वे कृत्रिम प्रकाश व रसायनों की सहायता से अब तो पूरे वर्ष यौवन पर रहते हैं। ये फूल ऐसे हैं जो घर की बाहरी तथा भीतरी दोनों सजावटों के लिए आकर्षक चटख रंगों में प्रकृति ने हमें सौंपे हैं। यदि उचित देखभाल व दाना-पानी गुलदाऊदी को मिले तो वह समय के साथ सदैव मुसकुराती-खिलखिलाती अपने परिवेश को जीवन्त और रंग-रंगीला बनाए रखकर मानव मन को सौत्साह जीने का मन्त्र देती है।
चन्द्रकान्ता शर्मा
Published on:
27 Dec 2017 05:25 pm
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