
chat ka navratra
- चन्द्रकान्ता शर्मा
फागुन के बाद जब चैत आता है तो मौसम का मिजाज पूरी तरह बदल जाता है। हवा में ठण्डापन होता भी है तो नहीं भी होता। लेकिन एक राग हवा में अवश्य तैरता रहता है। जो अल्प सुबह अथवा रात के अँधेरे में मंजीरे की धुन में बजता है। यों चैत मेलों का महीना भी है। ग्रामीण मेलों की भरमार लग जाती है। छोटे-छोटे कस्बों और नगरों में हाट बाजार लगते हैं तथा देहाती अपने मन के आनन्द की अभिव्यक्ति करते है। अलगोजे की बीन पर सुर साधते ग्रामीणों के झूण्ड रास्तों से निकलते हैं तो स्त्रियाँ हँसे बिना नहीं रहती बैलगाड़ियों के पहियों की चर-चूँ परिवेश में खनकती जान पड़ती है।
कृषि कार्यो से निपटकर धान निपजने की खुशी में पगलाया किसान मेलों की ओर दौड़ पड़ता है, गाँवों में यह विशेषता अभी भी प्रचलित है कि वहाँ साप्ताहिक बाजार लगते हैं। जिनमें पहुँचने वाले ग्रामीण सारे अभावों को भूलकर चेहरों पर सिवाय खुशियों के दूसरे भाव आने भी नहीं देते।
चैत का नवसंवत्सर भारतीय संस्कृति की पुरातन परम्परा की एक जीवंत साक्ष्य रूप में आज भी सोत्साह दिखाई देता है। समग्र भारत में इसका अपना विधि-विधान है तथा इसकी परिपाटी में संस्कृति की सौंधी गँध अभी भी महकती है। हवा के बदलते रूख के साथ ही यह त्यौहारों की कई छटाए लेकर आता है स्त्रियों का सजना-संवरना तथा गीत आलापना यहाँ की सांस्कृतिक विरासत में सम्मिलित है। खासतौर पर इस महिने में तो उत्सवप्रियता चरम पर होती है तथा वह सिंजारा, गणगौर , शीतला पूजन, नवरात्रा, रामनवमी, महावीर जयंती चेटीचण्ड, गुडफ्राइडे तथा वैशाखी पर्वो के आयोजनों में जीवंत रहती है। इस रूप में साम्प्रदायिक सद्भाव का मिला-जुला रूप चैत में दिखाई देता है। विविधता में एकता का भाव पिरो जाती है, यह चैत की हवा।
चैत के बारे में कवियों की अपनी भावनाऐं हैं। वे फागुन की चुहुलबाजी से तंग आकर इस माह में तनिक गंभीर होकर सोचते हैं। कविता गाँभीर्य यहीं से समारम्भ होता है। जो छन्द फागुन में निबंध थे। वे यहाँ आते थोड़ा सांस्कृतिक अनुशासन लेने लगते हैं। जिस माह में संस्कृति अपना प्रतिबिंब देखती हो। उस माह की विशेषताएँ अपने आप में सधन होती हैं तथा भारतीयता की सौ प्रतिशत प्रतिरूप भी। गीतों के स्वर प्रखर होने लगते हैं तथा कण्ठों में मधुरता पहले से कहीं ज्यादा होती है। सरसों का यौवन चरम पर होता है तथा किसान उसे ज्यादा मदमस्त होने से पहले ही काटकर उसके गर्व को चकनाचूर कर डालता है।
सरसों के पीले फूलों का वितान देखते ही देखते सिमटने लगता है तथा एक नूतन आल्हाद से सरावोर मनुष्य प्रकृति में खुशियाँ तलाशता है। नदियों का तेज प्रवाह एक धार में सिमटकर खामोश चाँदी के समान सफेद बनकर बहता है तथा आज के वृक्षों में कैरियाँ निकल आती है। कोयल चैत में भी कुहूकती है और उसने आम पर बैठना अभी छोड़ा नहीं है और ये हटियले तोतों के झुण्ड तो अपनी सभी जुटाए इधर से उधर दौड़धूप करते हैं अथवा कच्ची अमियाँ कुतरते रहते हैं।
चैत की सुबह पाँच बजे उठकर देखने पर दिखाई देती है। सूर्योदय के बाद उठने वालों को पता ही नहीं चलता कि यह माह चैत का है। चैत का पता विहान में चलता है। यह हवा बताती है। वह हवा जो एक बार पा लेता है, वह बार-बार उसकी मुद्रा से सामना करता है और सुख लूटता है।
उस समय दूध-दही की नदियाँ बहती है समग्र वातावरण में सूरज उगने का समय चैत का अपना मोहक और लुभावनेपन के साथ सबको आकर्षित कर लेता है। मनुष्य सारे अभाव भूलकर प्रकृति का वैभव लूटता है। इस रूप में यदि चैत की दुपहरी में घास का अहसास हो तो जो हवा पेड़ों से चलकर आती है। उसकी ठण्डक का अंदाजा वही मन लगा पाता है। जो चैत से साँस लेता है।
बेतहाशा भागते शहरों में चैत के दर्शन नहीं होते। उन्हें पता ही नहीं चलता कि यह कब आया तथा कब चला गया। पलाश, अमलतास, गुलमोहर और अन्य वृक्षों की बहार का आलम दर्शनीय होता है। फूलों से लदे-फदे वृक्ष अपने आल्हाद की अभिव्यक्ति करते हैं तथा फूलों में गँध बची होती है। वह इस माह में प्रखर हो जाती हैं।
चैत मनुष्य का वसंत होता है, जो पूरे एक वर्ष बाद लौटता है। इसका लोकानुरंजक स्वरूप साहित्य और संस्कृति में रचा-बसा है। उसके रंग कई रूपों में दिखाई देते हैं तथा यह भावी जीवन को एक सुख अहसास के साथ चलाने की राह भी बताता है। महिनों में जो चैत की बात है। वह दूसरे महिनों में कहाँ?
लोक संस्कृति के सम्पूर्ण मनोयोग को रचा-पचाकर यह एक सुकून देता है तथा गीतों को लय प्रदान करता है। गाँवों के छैलाओं में कहीं बेदर्द भाव पनपते हैं और वे बागों में बाँसुरी बजाकर अपनी भावाभिव्यक्ति को सार्थक करते हैं। तभी फिर चैत की हवा का झोंका शरीर में एक झूरझूरी जगा जाता है तथा वह निपेट नया संयोग भाव जगाने में सक्षम होती है। चैत की हवा फिर चल रही हैं। आप देखें, महसूस करें तथा साँसों में भर लें।

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