
kids on first day of school
- डॉ. शिल्पा जैन सुराणा
तेलंगाना सरकार ने हाल ही में बच्चो के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय लिया है और वो है उनके बस्ते के बोझ को कम करने का। इसके साथ ही प्राथमिक स्तर तक के विद्यार्थियों के होमवर्क पर भी रोक लगा दी। छोटे-छोटे बच्चे से ढाई वर्ष की उम्र में स्कूल जाने लगे है, क्योंकि विद्यालयों का सिस्टम बदल गया है, पहली क्लास में आने से पहले उन्हें तीन क्लास पास करनी पड़ती है। छोटे छोटे बच्चों को सिखाने के नाम पर ढेर सारी किताबे दे दी जाती है, छोटी सी उम्र में ही उन पर पढ़ाई का इतना सारा बोझ डाल दिया जाता है, वो बोझ उनके बस्तों में दिखाई देते है।
नन्हे मुन्ने बच्चे बस्तों के बोझ तले नज़र आते है। ये न उनके मानसिक अपितु शारिरिक स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदायक है। बच्चों को पीठ सम्बन्धित बीमारियों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा पानी और लंच बॉक्स का भी भार अलग है। सवाल ये है कि इतनी भारी भरकम फीस लेने वाले ये विद्यालय क्या बच्चों को शुद्ध पेयजल भी उपलब्ध नही करवा सकते? साथ ही स्कूल क्या बच्चो को लॉकर उपलब्ध नही करवा सकते जहाँ वो अपनी किताबे रख सके।
न्यायालय के भी निर्णय स्पष्ट है कि बच्चे के वजन का 10 प्रतिशत से ज्यादा वजन बस्ते का नही होना चाहिये। मगर वास्तविकता इससे अलग ही है। सवाल ये है कि हम क्यों बच्चों का मशीनीकरण करने में लगे है, निजी स्कूल अपनी फीस बढ़ाने के चक्कर मे मोटी मोटी किताबे बच्चो पर लाद देते है, वही अभिभावकों की भी ये मानसिकता रहती है कि बच्चे जितना पढ़ेंगे उतना होशियार बनेंगे। निजी स्कूलों की मनमानी के लिए अब सरकार को आगे आना होगा।
बच्चो का स्वास्थ्य पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। सरकार को चाहिए तुरंत प्रभाव से ये निर्णय पूरे भारत में लागू करे। आज के समय मे ऑडियो विसुअल तकनीक के माध्यम से भी बच्चों को सिखाया जा सकता है। अगर आधुनिक टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया जाए तो बस्तों का बोझ हल्का किया जा सकता है। उम्मीद है आने वाले समय मे अन्य राज्य और केंद्र सरकार भी इस मामले में कड़े कदम उठाएगी, कोशिश की जाए कि ये नियम पूरे भारत वर्ष के सभी निजी औऱ सरकारी विद्यालयों में लागू किया जाए।
Published on:
02 Aug 2017 09:39 am
बड़ी खबरें
View Allवर्क एंड लाईफ
ट्रेंडिंग
