
Guru
मुलाकात कीजिए बुद्ध रूपी गुरु एकापोल चांतावोंग से, भूल जाईए गुरु द्रोण को। शुरु करनी ही होगी गुरु और शिष्य की सही परंपरा। पिछले कुछ समय से गुरु शिष्य परंपरा का जितना विकृत रूप सामने आया है उतना पहले ना देखा। आशाराम-निराशाराम से लेकर रामरहीम-दाती तक....ना जाने कितने ढ़ोगियों की चरणवंदना की जाती रही। इस बीच एक अच्छी खबर आई थी...तमिलनाडु के थिरुवल्लूर के सरकारी स्कूल की। जहां युवा शिक्षक श्री जी.भगवान के तबादले पर ६वीं से दसवीं तक के बच्चे खूब रोए, उन्हें देख शिक्षक भी रो उठे। यही तो होती है गुरु-शिष्य परंपरा।
अब रुख करते हैं थायलैंड के २५ वर्षीय युवा कोच एकापोल चांतावोंग की तरफ। एकापोल, ने १० वर्ष की उम्र में ही माता-पिता को खो दिया। धीरे-धीरे वे मोह बंधनों से मुक्त होने के लिए मठ जाते हैं। बौद्ध भिक्षु बनते हैं...बीमार दादी की सेवा के लिए ३ साल पहले मठ छोड़ फिर सांसारिक जीवन में कदम रखते हैं। फुटबॉल टीम में जूनियर कोच की भूमिका निभाने लगते हैं। एकापोल सांसारिक जीवन में आ तो गए लेकिन खुदगर्जी से कोसो दूर...। दादी की सेवा करते हुए वे अपनी टीम के बच्चों को वैसे ही तराशते रहे, जैसे मठ में उनके बौद्ध गुरुओं ने-किताबों ने उन्हें तराशा होगा। वे बच्चों को सिर्फ मैच में जीत की जगह जिंदगी और स्वयं पर जीत के विरले पाठ भी पढ़ाते रहे। जब बच्चे छियांग राय की थैम लुंग गुफा में फंसे थे तो बाहर की दुनिया से आवाज आ रही थी, कोच बच्चों को लेकर मौत की गुफा में गया ही क्यों? वे भूल गए थे इस कोच का नाम 'एकापोल' है। वे बच्चों को गुफा में अकसर लेकर जाते थे, मौत और अंधेरे के डर पर जीत हासिल करने के लिए। यह लगातार वहां जाने की प्रैक्टिस ही तो थी, एकापोल का हौंसला ही तो था कि गुफा में १० किलोमीटर अंदर-कीचड़-दलदल में फंसे बच्चों का हौंसला ना डगमगाया। वे अपने डर को काबू में कर १८ दिन अंधेरों से जीतते रहे। आज पूरे विश्व पर अवसाद हावी है। ये बच्चे अपनों से दूर अंधेरी गुफा में थे। इनके पास का खाना खत्म हो चुका था। गुफा में हर पल मौत की दस्तक थी। उसके बाद भी इनकी मानसिक स्थिति बिलकुल सामान्य....कारण इन्हें जिंदगी और मौत के बीच की इस गुफा में 'स्वयं से जीत' का पाठ पढ़ाने वाला गुरु एकापोल हर पल साथ था।
विश्व के इतिहास में गुरु-शिष्य परंपरा के रूप में स्वर्णिम अक्षरों से लिखी यह कहानी शुरु होती है, २३ जून के दिन। खिलाड़ी अपने कोच के साथ एक दोस्त का जन्मदिन मनाने गुफा में गए थे। बाढ़ के पानी के कारण वहीं फंस गए। गुफा के मुहाने पर बच्चों की साइकिल देख महसूस हुआ बच्चे गुफा में होंगे। फुटबॉल टीम के एक खिलाड़ी (जो तबीयत खराब होने के कारण प्रैक्टिस में नहीं गया) ने राज खोला, वे सभी अकसर उस गुफा में जाते हैं। नौ दिन बाद खुलासा हुआ, बच्चे गुफा में कहा फंसे हैं। सोचिए अंधेरी गुफा...पानी...बच्चों के पास सिर्फ चार दिन का भोजन। ऐसे में एकापोल १८ दिन तक बिना कुछ खाए रहे। उन्होंने बच्चों को ध्यान की मुद्रा सिखाईं...अपने डर पर जीतना, स्वयं पर जीतना सिखाया। दुनिया का सबसे मुश्किल पाठ जिसे सीखने में सारी उम्र खप जाती है, उसे एक पल में ही बच्चों को सिखा दिया, 'स्वयं पर विश्वास' करना। विपरीत परिस्थितियों में 'स्वयं पर काबू' रखना। घबराहट और डर से जीतना। बच्चों से संपर्क के समय जो पहली बात बाहर आती है...हम सब ठीक हैं। पहली चिट्ठी बाहर आती है...गुरु क्षमा मांगता है। वादा करता है, विश्वास दिलाता है...आपके बच्चों का अच्छे से ख्याल रखूंगा। मेरे कारण वे विपरीत परिस्थितियों में फंसे, माफ कर दीजिए। वहीं बच्चे कहते हैं, वे बहादुर हैं, ठीक हैं। पसंद का खाना खाना है। अपने बड़ों के कामों में सहयोग करना है। जल्द मुलाकात होगी। 'बच्चों के कान में बहादुरी' औऱ अपनत्व का यह मंत्र फूंकने वाले गुरु का नाम है 'एकापोल।'
अब एकापोल की दुनिया से निकलकर हम अपनी दुनिया की ओर आते हैं। हमारे यहां हर गली औऱ चौराहे पर स्वयंभू गुरु फैले-पसरे पड़े हैं। ये कभी आपको गृहदशा से डराते हैं तो कभी दुनियादारी से। कभी लोक-लाज का डर दिखाते हैं तो कभी तंत्र-मंत्र की शक्ति का। एकापोल के बहाने एक बार स्वयं के मस्तिष्क को झिंझोड़ कर देखिए औऱ सोचिए। क्या सचमें यही गुरु हैं? गुरु वह जो अंधेरों में रास्ता दिखाए....ये तो वे ढ़ोंगी हैं जो डर की सत्ता पर अपना साम्राज्य चलाते हैं। गुरु वो जो अपने हिस्से का भोजन अपने शिष्यों में बांट दें, ये गुरुघंटाल तो आपको डरा, डरे मन से हर काम की मोटी-तगड़ी राशी वसूलते हैं। एकापोल, चरणवंदना तो आपकी होनी चाहिए जो डर के हिज्जों को उल्लास की किरणों में बदलने का हौंसला रखते हैं। जिसके विश्वास पर ११ साल की उम्र का सबसे छोटा खिलाड़ी टाइटन अंत तक गुरु के साथ गुफा में रहने का फैसला करता है। टाइटन ही वह है जिसे एकापोल से पहले अर्थात सारे खिलाड़ियों में सबसे अंत में बाहर निकाला गया। एकापोल ये आप ही हैं जिनके कारण अंधेरी गुफा में १८ दिन बिना खाने के फंसे होने के बावजूद बच्चे मानसिक और शारीरिक तौर पर फिट हैं....बाकी तो सब गुरु घंटाल हैं जो सुशिक्षित समाज में विकृति का जहर घोल रहे हैं। आप जैसा गुरु निराशा से आशा, अंधेरे से उजाले की ओर ले जाता है वहीं छद्म गुरु के चक्कर में हम लोग रोज नए निराशाराम की छवि गढ़ रहे हैं, अपने समाज पर थोप रहे हैं।
आपका ह्दयतल से शुक्रिया मुझे जीवित रहते हुए बुद्ध के दर्शन हो गए...अन्यथा बचपन और किशोरावस्था की कई रातें यह सोचते हुए करवटों में बदली हैं, सिद्धार्थ का बुद्ध रूप वास्तव में सत्य है या अतिश्योक्ति...आपको देख विश्वास है जब बौद्ध शिक्षा, शिष्य को इतना महान बना सकती है तो बुद्ध, अद्भुत होंगें ।
श्रुति अग्रवाल
Published on:
11 Jul 2018 04:18 pm
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