
Side Effects of Movies
भारतीय फिल्मों के निर्माता और निर्देशक अपनी फिल्मों में स्त्री पात्रों के शरीर पर कम से कम वस्त्र रखना चाहते हैं। अब तो जैसे अभिनेत्रियों को भी कपड़े रास नहीं आते, इसलिए वे भी ऐसी ही रहना चाहती हैं। फिल्मी दुनिया में राजकुमार एक ऐसे निर्माता-निर्देशक हैं जिन्होंने अपनी हर नई फिल्म में नायिका की ज्यादा से ज्यादा देह दिखाने का साहस किया है। देखा-देखी तमाम फिल्म निर्माता-निर्देशक अपनी फिल्मों में इसे अनिवार्यता के रूप में स्वीकार कर रहे हैं। राजकपूर की बॉबी और सत्यम-शिवम-सुन्दरम फिल्में इन्हीं बातों की साक्षी हैं। इसके साथ ही फिल्मी अभिनेत्रियों ने इन मामलों को लेकर नाम कमाया है।
इनमें प्रमुख अभिनेत्रियां-जीनत-अमान, पझा खन्ना, जयश्री टी., बिन्दु पझिनी कोल्हापुरे, टीना मुनीम, प्रेमानारायण, परवीन बॉबी, रंजीता आदि हैं। यहाँ प्रश्न अब यह उठता है कि फार्मूला प्रधान भारतीय फिल्मों से आखिर हमारे समाज को मिला क्या है? मेरे विचार से भारतीय सिने व्यवसायियों ने समाज को एक भी ऐसी फिल्म नहीं दी है, जिसे जीवन के व्यावहारिक पक्ष से जोड़ा जा सके। अपितु सिने व्यवसायियों ने दर्शकों की रूचि को भी विकृत कर दिया है। यदि कोई अच्छी फिल्म बनाता भी है तो आज का दर्शक उसे पीट देता है और आगे से ऐसी फिल्मों के निर्माण के लिए चेतावनी बन जाता है।
यही नहीं, स्वयं निर्माता और निर्देशक भी इन शिक्षा प्रधान फिल्मों में भी अश्लील अंग प्रर्दशन और प्यार के आलाप में डूबे गाने तथा संगीत का मोह नहीं छोड़ पाया है। थोड़ी बहुत सही रूप में कोई फिल्म बनती भी है तो वह कोई पुरस्कार प्रदान कर दफना दी जाती है।
एक खास कथा सांचे में ढ़ली भारतीय फिल्में इस वक्त समाज को हत्या, बलात्कार, चोरी, डकैती और सेक्स के नए-नए गुर सिखा रही है तथा फिल्मों के डॉयलॉग, गीत, अभिनय के अंदाजों और माहौल में अश्लीलता इस कदर बढ़ गई है कि एक परिवार के सदस्य इन्हें एक साथ देख भी नहीं सकते। वैसे आधुनिकता के नाम पर सारी नैतिकताओं और मान-मर्यादाओं को ताक में रखकर कुछ विशेष वर्ग के परिवार ऐसा करने का दुस्साहस भी कर रहे हैं।
प्रत्येक फिल्म में खलनायक और खलनायिका का होना, अपराधों में वृद्धि का कारण बन गया है। भारतीय दर्शक ऐसा है जो जैसा फिल्म में घटता है, उसे वास्तविकता मानकर उसी अनुरूप आचरण करता है। बढ़ता हुआ फैशन इसका ज्वलंत उदाहरण है। कल जिस फिल्म में जो नया फैशन आया है वह आज युवक-युवतियों में दृष्टिपात होने लगता है।
आजकल फिल्मों का प्रदर्शन टी. वी. पर भी अत्यंत लोकप्रिय हो गया है, जिसे परिवार और आस पड़ौस एक जगह बैठकर देखता है। परिवार के छोटे बच्चे जब इन फिल्मों को देखते हैं तो रूग्ण मानसिकता का जन्म होता है, जिससे बालक दिनभर इन फिल्मों के गाने गाता है या उसकी स्टोरी सुनाता फिरता है या फिर अकेले में फिल्म नायक या खलनायक, जिसकी भी एक्टिंग उसे पसन्द आई है, रिहर्सल करता फिरता है।
पढ़ाई में या तो वह कमजोर रह जाता है या फिर वह पढ़ ही नहीं पाता। माता-पिता भी इस ओर उचित ध्यान नहीं दे पाते और बच्चों की प्रवृत्तियाँ दूषित होती चली जाती हैं। इसके लिए माता-पिता अभिभावकों का दायित्व है कि वे अपने बच्चों पर पाबन्दी लगाएँ और टी. वी. के वे ही कार्यक्रम दिखलाएँ जो खासतौर पर बच्चों के लिए तैयार किए जाते हैं। दरअसल भारतीय फिल्में किसी भी सामाजिक समस्या का उचित समाधान देने में लगभग विफल रही है।
ऐसी स्थिति में समाज को ही पुनर्विचार करना होगा कि वह किस तरह की फिल्में देखना चाहता है। क्या वह अभी तक सुहागरात के दृष्यों, बाथरूम में नहाती नायिका, बलात्कार और हत्याओं के दृष्यों तथा प्रेमालाप के दृष्यों की ही पुनरावृत्ति चाहता है ? तो इससे आखिर नई पीढ़ी को मिलने वाला क्या है ? फिल्में मनोरंजन का ही साधन न समझें, फिल्में समाज के उत्थान और पतन में भी महती भूमिका निभाती है।
चन्द्रकान्ता शर्मा
Published on:
27 Mar 2018 04:28 pm
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