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गुलाब फूलों का राजा है और भव्यता तथा सुन्दरता में इसका सानी नहीं है।

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Jameel Ahmed Khan

Feb 08, 2018

Rose

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गुलाब फूलों का राजा है और भव्यता तथा सुन्दरता में इसका सानी नहीं है। सुगन्ध इतनी प्रखर कि दूर से ही पता चल जाए कि कहीं गुलाब खिल रहा है। इन्हीं विशेषताओं ने इसे राजा का पद दिया है। यह प्रेमियों की भावनाओं का प्रतीक तथा हर उम्र में हर किसी को भानेवाला है। यह भेंट में प्रस्तुत कर मानवता को दर्शाता है, वहीं इसकी सज्जा से आभा द्विगुणित हो जाती है। गुलाब का पौधा लगाना हर आदमी अपनी शान समझता है तथा उसे देखकर इतराता है। उसे लगता है जैसे उसने राजा को घर में लगाया है।

शादी-विवाह तथा मांगलिक कार्यो में इसके फूल व मालाओं का उपयोग होता है। इस दृष्टि से गुलाब जो दर्जा ले सका है वह अन्य कोई नहीं ले सका है। आज स्थिति यह है कि गुलाब की सैकड़ों किस्में विकसित हो चुकी हैं तथा यह लुभावने रूपों में सामने आया है। पंडित जवाहर लाल नेहरू को गुलाब अत्यन्त प्रिय था और वे अपनी अचकन पर तथा कमरे में नित्य ताजे गुलाब लगाया करते थे। गुलाब अकेला सुन्दर और सुगन्धित फूल हो ऐसा भी नहीं है अपितु यह दवा के रूप में भी बहुतायत से काम आता है।

इस दृष्टि से गुलाब का व्यावसायिक महत्व भी बढ़ा है। गुलकन्द निर्माण में इसकी पत्तियाँ सर्वाधिक काम में आती हैं। यह इतना स्वादिष्ट और उपयोगी होता है कि ग्रीष्म ऋतु में होने वाली अनेक बीमारियों का शमन करता है। इसका निकाला हुआ जल लम्बे समय तक काम में आता है। यह कान और नाक में दर्द-फुंसी में अत्यन्त उपयोगी है। गुलाब अर्क को तेल में मिलाकर शरीर पर लगाया जाए तो कोई भी एलर्जी हो मिट जाती है।

माइग्रेन में नौसादर के साथ गुलाब जल मिलाकर नाक में डालने से लाभ मिलता है। दाँतों में मवाद, खून आता हो तो इसका पूरा फूल मसलकर दाँत में दबा लें, पूरा लाभ मिलेगा। उल्टी, दस्त, दाद, हैजा, छाले तथा कब्ज में भी गुलाब और उसके जल का उपयोग विविध प्रकार से किया जाता है तथा इनमें फायदा होता है। आज हमारे यहाँ गुलाब व्यावसायिक रूप से विकसित हो चुका है।

इसकी विविध प्रजातियों की खेती हो रही है तथा यह निर्यात भी किया जा रहा है। चाहे कटे फूलों से कमाई हो या फिर इसकी सुगन्ध का व्यापार हो या फिर खेती करके लाभ लिया जाए। यह फायदे का धँधा बन चुका है। हालांकि गुलाब सार-सम्भाल चाहता है। अत: खेती में श्रम अधिक माँगता है लेकिन एक बार व्यवस्थित होने के बाद इसकी फसल से लाभ ही लाभ है। उत्तर प्रदेश में इस समय इसकी खेती सबसे ज्यादा की जा रही है।

इसके बाद राजस्थान, बिहार तथा उड़ीसा में इसकी खेती की जा रही है। यों गुलाब उगाया तो सभी जगह जाता है लेकिन यह व्यावसायिक रूप में इन राज्यों में मण्डी बन चुका है। सुगन्ध के व्यापार में रोजा डेमेसीना, एडवर्ड, रोजा बोबानिया, केबेज तथा सेंटीफोलिया की किस्में ज्यादा कारगर रही हैं।

भारतीय गुलाब में सुगन्ध के तत्त्व सर्वाधिक पाए जाते हैं तथा ये विश्व के सबसे प्रसिद्ध मुल्गारियाई गुलाबों को मुकाबला करते हैं। गुलाब जल, गुलाब इत्र तथा रूहे गुलाब-पेय पदार्थो, मिठाइयों, अगरबत्तियों, शर्बतों तथा दवाओं में काम आता है। इसकी नई तकनीकें निरन्तर खोजी जा रही हैं तथा व्यावसायिक लाभों के लिए सतत् प्रयास किए जा रहे हैं। इस समय उत्तर प्रदेश में पाँच सौ तथा तमिलनाडु में तीन सौ हैक्टेयर भूमि में इसकी खेती हो रही है।

फूलों को उचित संरक्षण देने के लिए जहाँ समुचित खाद तथा तापमान की आवश्यकता है वहीं जमीन में पाए जाने वाले कीटाणुओं-कीड़ों से इन्हें बचाने की आवश्यकता है। वैसे गुलाब अक्टूबर से दिसम्बर तथा फरवरी से अप्रैल वर्ष में दो बार फूल देता है। इसकी खेती से प्रति हैक्टेयर करीब चालीस हजार रूपये की बचत-लाभ में मिल जाती है। क्योंकि इसका निर्यात गत वर्षो की तुलना में दस गुना बढ़ चुका है।

दिल्ली के पूजा संस्थान ने भारतीय गुलाबों की अनेक किस्में विकसित की हैं। यह समशीतोष्ण तथा ३००१ जलवायु का पौधा है। दूसरा मिट्टी में इसकी पौध उन्नत पनपती है। मिट्टी का पी.एच. मान ७-८ तक हो सकता है। अधिक छापा और नमी तथा लू के गर्म थपेड़े इसे बरदाश्त नहीं होते। अत: इसे संतुलित रूप से ही पोषित करना पड़ता है।

करीब आठ सेंटीमीटर के गड्ढ़े खोदकर मिट्टी निकालकर पन्द्रह दिनों इन्हें खुला रखना चाहिए। फिर प्रति हैक्टेयर इसमें करीब चार सौ क्विंटन सड़ी गोबर की खाद साथ में पच्चीस क्विंटन सुपरफॉस्फेट मिट्टी में मिलानी चाहिए। फिर इनमें नई पौध अक्टूबर तथा सिंगल फॉस्फेट व म्यूरेट ऑफ पोटाश की खुराक देते रहना पड़ता है। पौध पर कलिशयान (बडिंग) की आवयकता होती है जो सितम्बर माह से मार्च तक की जानी चाहिए।

जड़ों की निराई, काँट-छाँट अक्टूबर माह में किया जाना ठीक रहता है। गुलाब की खेती अकेले स्तर पर किया जाना जटिल है। अत: इसके लिए सहकारी तथा राजकीय स्तर पर प्रयास होने चाहिए। आज अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में गुलाब पहुँचाने के लिए इतने साधनों की आवश्यकता है कि उन्हें निजी स्तर पर किया जाना सम्भव नहीं है। अत: सहकारी समितियाँ बनाकर साधन जुटाए जाने चाहिए, ताकि उपज खराब न हो तथा समुचित स्थान और समय में फूलों को पहुँचाया जा सके। क्योंकि फूलों की ताजगी ही इसकी व्यावसायिक सफलता में मूल सूत्र है।

विदेशी मंडियों में इन फूलों की असीम माँग है तथा सार-सम्भाल तथा सावधानी से यह खेती की जाए तो नुकसान नहीं है। जून पार्क, मौटे जूमा, मार्गेट, क्रिश्चियन डायर, व्लू मन डायमंड जुबली, क्लियोपेट्रो, सन्विल स्पार्क, एफिल टावर, प्रिलूड, गुलजार, गंगा, पूसा सोनिया आदि नामों से अलंकृत गुलाब की किस्में लोकप्रिय हैं।

इनमें से चयन आपको खेत के तापमान व मिट्टी की दृष्टि से करना चाहिए। गुलाब फूलों का राजा है। यह बलवद्र्धक, रक्तशोधक तथा कब्जनाशक है। इसकी विविधता तथा उपयोगिता में अब संशय नहीं है, इसलिए इसकी खेती की उपयोगिता लोकप्रिय हो रही है। गुलाब की प्रशंसा में हमारा हिन्दी साहित्य तथा विश्व साहित्य भरा पड़ा है। शेक्सपियर ने भी इसकी प्रशंसा की है।

यह वेदों में भी अपना स्थान बना सका है। यह प्राचीनतम पुष्प है तथा अब यह लोकप्रियता के शिखर पर है। इसके व्यावसायिक लाभों को दृष्टिगत रखते हुए इस दिशा में सोचना बुरा नहीं है। इसलिए गुलाब की खेती की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए।

चन्द्रकान्ता शर्मा