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ये कैसी दुनिया बना रहे है हम

बचाना होगा अपने बच्चों का बचपन

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Sunil Sharma

Sep 11, 2018

depression

tension

- श्रुति अग्रवाल

माँ...बचपन की काची माटी को आकार देने वाली कुम्हार। पहली शिक्षक। जिसके लाड़-प्यार-दुलार-झिड़की से बचपन की दहलीज किशोर अवस्था तक पहुंचती है। यौवन का आकार लेता है। संस्कार की नींव डलती है। वो माँ के ही संस्कार होते हैं जिसके कारण बुढ़ापे में चेहरे पर आई झुर्रियां भी मुस्कुराती हैं।

हमारी सांसों में माँ महकती हैं...उनके संस्कार चहकते हैं लेकिन अब वक्त बदल रहा है। बदल रही है पहली गुरु...पहली गुरु का बदलना अंदर तक डरा रहा है। बात अभी की ही है....मैं दिल्ली से वापस आ रही थी। मालवा ट्रेन का सफर कुछ बोझिल होता है लेकिन किताबें साथ हो तो सुहावना हो जाता है। फिर थ्री टायर कूपे में लोगों की आवाजाही-चहलकदमी एक दूसरी दुनिया में ले जाती है। रात को खुलते-महकते टिफन...मसाला लगी बातें और मुस्कुराते-चिल्लाते-धमाचौकड़ी मचाते बच्चे। सब कुछ अलहदा सा। दूसरी दुनिया का लेकिन इस बार सब नदारद...बोझिल लगा। एक साल के बच्चे के हाथ में भी मोबाइल। बच्चे शांति से अपनी आंखे गढ़ाए हुए थे, मुई स्क्रीन पर। बीच-बीच में गेम्स की आवाज या कोई कार्टून या गाना ही सन्नाटा तोड़ रहा था। मैं जिस महक औऱ चहक की बात कर रही थी वह सब नदारद थी।

मालवा लेट थी तो लगा बच्चे थक गए हैं। 7 बजे की ट्रेन कुछ 8.30 तक रवाना हुई थी। थकान मुझे भी थी इसलिए जल्द सो गई। अब ट्रेन लेट थी तो सुबह उसका बेहतरीन लेट होना जायज था। मुझे लगा अब तो ट्रेन में धमाचौकड़ी और चिल्लपौ मचेगी लेकिन शांति थी। मैं किताब में खो गई। कुछ देर बाद पोहे का नाश्ता लिया औऱ हाथ धोने बॉशवेशन पर गई..वहां एक माँ तीन साल के बच्चे को ***** ..बेवकूफ...नाक में दम कर रखा है। बेहद तीखी आवाज में चिल्ला रही थी। मुझसे रहा नहीं गया तो पूछ लिया, कोई तकलीफ है। फिर तो माँ ने परेशानियों का पुलिंदा खोल दिया...चिप्स ही खाना है। चार तरह के पैकेट ला दिए। खाते समय चुप्प...खत्म होते ही औऱ चाहिए। अब चार पैकेट चिप्स के बाद तो पोहे खा सकता है....तीन साल का बच्चा, उफ्फ। फिर जब देखो तब मोबाइल, बच्चों का टैबलेट दिया है इसे लेकिन इसको मोबाइल ही चाहिए। मोबाइल में ज्यादा गेम्स हैं। टैबलेट में कम। अब इसके पापा को मोबाइल पर काम है। इसे चाहिए, इसलिए रो रहा है। सच सुबह से इरिटेट कर रखा है। मैं उस बच्चे की सूजी आंखें और माँ का चेहरा देखती रही।

ये आंखें लगातार रोने के कारण ना सूजी थीं, ये आंखें सूजी थीं लगातार टेबलेट और मोबाइल देखने के कारण। मैंने माँ से पूछने की गुस्ताखी कर दी...क्या हुआ, इतने छोटे बच्चे को गधा, ***** कहना, उसकी सैल्फ स्टीम कम करना है। इतनी कम उम्र में मोबाइल देना ही नहीं चाहिए। माँ जो कि बेहद युवा थी, 10-15 साल छोटी होगी मुझसे। बोली दीदी, ये सुबह से इरीटेट कर रहा है। मोबाइल और टैब चाहिए। मैंने पूछ लिया, कुछ बच्चों की किताबें या खिलौने हैं क्या? माँ के चेहरे पर शून्य के भाव थे। आप ही सोचिए... इतना लंबा सफर...बच्चे के मनोरंजन के लिए कुछ भी नहीं रखा। खाने के लिए कुछ नहीं।

याद है जब आयुष 3 साल के थे, माँ की सख्त हिदायत थी, बैग भरकर खिलौने साथ रखना बच्चा बोर हो जाता है, जल्दी। साथ ही अलग-अलग तरह के घर के बने फिंगर फूड भी, जिससे वह कुछ खाता रहे। मोबाइल और टैब के चक्कर में इस तरह की तैयारियां पीछे छूट रही हैं। नादान उम्र का बच्चा वर्चुअल दुनिया में खोता जा रहा है। माँ-बाप, अभिभावक, स्कूल, समाज सब चुप हैं। हम उनके आस-पास एक अलग सी दुनिया बना रहे हैं। वह वर्चुअल दुनिया से जुड़ वास्तविक दुनिया से दूर बहुत दूर होता जा रहा है। ये हालत सिर्फ एक माँ की नहीं थी, मैंने वापस कूपे में जाते समय देखा 1 साल से 14 साल के हर बच्चे के हाथ में इलेक्ट्रानिक गैजेट था। कोई मोबाइल तो कोई टैब की दुनिया में खोया था। सबके पास चिप्स के पैकेज औऱ कार्बोनेटेड ड्रिंक्स थे। डरावना माहौल था। इस घटना के बाद लंबे समय तक किताब में मन ना लगा।

हम कैसी दुनिया बना रहे हैं। समाज-अभिभावक और स्कूल की जिम्मेदारी तो बाद में आएगी। तय की जाएगी लेकिन सबसे पहले संभलना बच्चों की प्रथम गुरु को होगा। संभलना माँ को होगा। उन्हें ही आगे आकर बचाना होगा अपने बच्चों का बचपन। देनी होगी शिक्षा संस्कारों की। दिखानी होगी सही दुनिया। याद रखिए कृष्ण को यशोदा ने बनाया था, शिवाजी को जीजा बाई ने। हर बच्चे की जिंदगी में मुस्कान और सफलता की नींव उसकी माँ ही रखती है। माँ , प्रथम गुरु आपको बारंबार प्रणाम है। एक बार रुक कर सोचिए...प्रथम गुरु का दायित्व-दर्जा बहुत बड़ा है, ये जिम्मेदारी है आपके कांधों पर। अपने बच्चों को वर्चुअल दुनिया में खोने से बचा लीजिए। ब्लू व्हैल के बाद मोमो चैलेंज...ये सब तो आते-जाते रहेंगे, आपके नौनिहाल की ढ़ाल आपको ही बनना होगा।

-फेसबुक वाल से साभार