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बुनकरों की व्यथा!

जुलाहें जिन्हें बुनकर तथा कोली नाम से भी जाना जाता रहा है, समाज में स्थित अन्य जातियों की तरह एक उपेक्षित जाति है।

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Sunil Sharma

Feb 23, 2018

bunkar

bunkar problems in india

- चन्द्रकान्ता शर्मा

राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में जुलाहों का जीविकोपार्जन दिनों-दिन कठिन होता जा रहा है। औद्योगिक विकास की लहर गाँव में पहुँच जाने से जुलाहों को रोटी के लाले पड़ गये हैं। जुलाहें जिन्हें बुनकर तथा कोली नाम से भी जाना जाता रहा है, समाज में स्थित अन्य जातियों की तरह एक उपेक्षित जाति है। इन लोगों की बस्तियाँ भी गाँवों में सवर्ण लोगों से अलग-थलग एक और ही पाई जाती है। दीन-हीन फटेहाल अवस्था में जी रहे जुलाहें अब शनैःशनैः रोटी की जुगाड़ में अपने मूल कार्य को छोड़ते जा रहे हैं और अन्य धंधे अपनाने को बाध्य हो रहे हैं।

जुलाहा मूलतः सूत कातकर उनकी घुर्टियों से ताने-बाने पर मोटे रेजे बनाने का काम करता रहा है। यह रेजे रजाईयाँ-लिहाज तथा अन्य मोटे कपड़े से बनने वाली पोशाक बनाने के काम आता रहा है। इसके अतिरिक्त जुलाहा ऐसा मोटा कपड़ा भी हाथ से बुनता रहा है जो ग्रामीणों के अंगरखे, कुर्ते, कमीज तथा धोतियों के काम में आता रहा है। अब भी वैसे ग्रामीण इलाकों में जुलाहों के साप्ताहिक बाजार (हटवाड़ा) लगते हैं। जिनमें आस-पास का जुलाहा वर्ग आकर इकट्ठा होता है। इन बाजारों में फुटकर बिक्री के अतिरिक्त वर्णिक वर्ग द्वारा थोक के भाव से खरीद होती है जिन्हें दूकानदार लोग रंगवाकर रजाईयाँ बनवाने के काम में मुख्य रूप से काम लेते हैं। परन्तु अब तो गाँवों में भी शहरों की हवा पहुँच गई है, इसलिए मोटे रेजे का चलन समाप्त प्रायः होता जा रहा है तथा उसकी एवज मीलों में बने कपड़ों के वस्त्र तथा जाड़े के लिहाफ व रजाईयाँ तैयार कर काम में ली जाने लगी हैं।

वैसे रेजे की रजाईयाँ सर्दी में मील के कपड़े की तुलना में अधिक गर्माहट तथा आरामदायक होती है साथ ही साथ सस्ती और अधिक समय तक चलने वाली भी। लेकिन गाँवों में नयी शहरी हवा ने रेजे के कपड़े की भयंकर उपेक्षा कर दी है। जिससे ग्रामीण जुलाहों का यह मूल धंधा निरन्तर चौपट होता जा रहा है। गाँवों में बड़ी ही दयनीय स्थिति में पारम्परिक रहन-सहन के वातावरण में रह रहे जुलाहे गरीबों की रेखा से भी नीचे का जीवन स्तर जीने को विवश हैं। महाजनी प्रथा के शिकार ये जुलाहे ऋणग्रस्त जीवन को समर्पित हैं तथा यही कारण है कि इस गिरी हुई माली हालत के कारण वे लोग न तो स्वयं शिक्षित हो पाये न ही उनके बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का ही कोई प्रबन्ध है।

अशिक्षा के घोर दायरे में रहने के कारण सरकारी नोकरियों में भी इन लोगों का कार्य के अवसर सुलभ नहीं हो पाते हैं। राजस्थान के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों के संवेक्षण के बाद यह देखने में आया है कि बुनकर अपने बुनने का कार्य छोड़कर अब या तो सिलाई का कार्य करने लगे हैं या फिर बाजा बजाने का कार्य अपनाया गया है। कहीं-कहीं कोली समाज बागान तथा खेती-बाड़ी की और भी मुड़ा है। सिलाई तथा बाजा बजाने का यह कार्य ऐसा है जिसका गाँवों में कोई अच्छा भविष्य नहीं है। शादी-ब्याह के अवसर पर ही सिलाई और बाजों का महत्व बढ़ता है वरना गाँवों में इन साधनों का उपयोग इतना अधिक नहीं है। फिर सिलाई तथा बाजा बजाने की दरें भी शहरों की तुलना में गाँवों में कई गुना कम है। इसलिए मूल धंधे से कट कर भी जिन्दगी बोझ बनी हुई है।