
Indian Women
परिवार में और समाज में औरत को दोयम दर्जे पर रखने के लिए पुरुष लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह उसे भावनात्मक रूप से लगातार ब्लैकमेल करता रहे । जिस भी रिश्ते से औरत उससे जुड़ी है, उस रिश्ते को महिमामंडित करता रहे और लगातार उस पर हावी रहे । औरत की हर रिश्ते में एक खास छवि बना दी गयी है- बेटी के रूप में, बहन, पत्नी, मां और सास (सास अगर वह किसी पुरुष की है) के रूप में । इन सब रिश्तों में जहां भी वह पुरुष से जुड़ी है- वहां एक खास किस्म की आज्ञाकारिता, सहनशीलता और चुप्पी की उससे अपेक्षा बन जाती है ।
इसी सब में ‘देवी’, ‘सम्मान’, ‘पवित्रता’ जैसे शब्द डालकर औरत की ऐसी छवि तैयार कर दी गयी है, जिस जगह वह है, वहां से जरा सा इधर-उधर होते ही उसका अस्तित्व, उसकी पहचान ही संकट में पड़ जाती है । जब-जब भी इस छवि से बाहर निकलने की औरत ने कोशिश की है, उसकी ओर उंगली उठ गयी है, आक्षेप लगाये गये हैं, उसे जबरन जहां प्रतिष्ठित किया गया है, वहां से ही गिराने की कोशिश की गयी है ।
यह छवि खुद औरत पर इस कदर हावी है कि वह निरंतर हाथ-पैर समेटकर बनाये गये फ्रेम के अंदर कैद रहने की कोशिश करती रहती है । इसके बाहर भी उसकी पहचान बन सकती है, यह खुद वह नहीं जान पाती । त्रासदी यह है कि इस छवि की कैद औरत को कैद नहीं लगती, क्योंकि पुरुष लगातार उसे भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करता रहा है । उसे फुसलाता रहा है कि अगर वह उसके कायदों को मानकर चलती रहें, तब वह सम्माननीय है, देवी है, ‘अच्छी’ स्त्री है, उसे पुरुष का प्यार , अपनापन और तमाम भौतिक सुविधाएं पाने का हक मिलेगा-मिलता भी है । चेहरे पर पड़े परदे से कहीं ज्यादा नुकसान आंखों पर पड़ा परदा करता है, यहां तो यह परदा बाकायदा औरत के दिमाग पर डाल दिया गया है । पुरुष जानता है कि इस परदे के पीछे जो दिमाग है, वह उसके जैसा ही है, सोचने-समझने और निर्णय करने की क्षमता इस दिमाग में भी उतनी ही है, जितनी खुद उसके दिमाग मेें है । और इसीलिए यह जरूरी हो जाता है, औरत को किन्हीं और-और दबावों में रखकर उसके दिमाग को लगभग नाकारा सिद्ध कर देना । जहां-जहां भी औरत ने दिमाग का इस्तेमाल किया है, पुरुष इस बात को अच्छी तरह समझ गया है ।
इसीलिए उसे लगा कि इस दिमाग को इस्तेमाल ही न करने दिया जाये या अपनी पकड़ में रखा जाए । दिमाग को निष्क्रिय करना आसान काम नहीं है, इसलिए जरूरी था उसको दूसरी ओर मोड़ देना। औरत को उसकी शारीरिक सीमाएं समझाकर अपनी सरपरस्ती में लेना और फिर उसे एक सजी-धजी, आज्ञाकारी, अच्छी भली सी छवि में कैद रहने को विवश कर देना ।
औरत के दिमाग का इस्तेमाल बेशक हुआ है, लेकिन उन सीमाओं के भीतर, जो उसके लिए बना दी गयी हैं । अपने लिए किये गये दूसरों के निर्णयों को उसने बहुत अच्छी तरह लागू किया है । बार्बी जैसी विदेशी गुडि़याओं की छवि के अनुरूप खुद को ढालने में औरत को जीवन भर इतनी मेहनत और इतना दिमाग लगाना पड़ेगा कि उसकी रचनात्मक शक्तियां यों भी खत्म सी ही हो जाएंगी और यह होता रहा है ।
शालीनता, शर्म, संकोच और आज्ञाकारिता के दायरे के बीच खुद को पुरुष के लिए आकर्षक बनाये रखना औरत के लिए पहले भी बहुत जरूरी था और अब इस उपभोक्ता संस्कृति के बीच औरत चूंकि कहीं ज्यादा उपभोग्य बन गयी है, इसलिए अपने आपको कम उम्र, आकर्षक और किसी पतली-दुबली गुडि़या जैसा दिखना उसे और जरूरी लगने लगा है । यह उसके लिए कहीं ज्यादा नुकसानदेह भी साबित हो रहा है । इसे वह कहां तक समझ रही है ? औरत को पहले नियम-कायदे बनाकर उसमें कैद करने उसे समझाना कि यहीं रह कर वह सम्मान पा सकेगी और फिर जब वह इस ‘सम्मान’ का प्रयास करती है, तो उसकी इस कैद के बाहर खड़े होकर उसे बेअक्ल साबित करना सदियों की साजिश का परिणाम है ।
इस नये माहौल में पुरुष अपने तर्क और भी सशक्त ढंग से रख रहा है, जबकि महिलाएं अपनी शारीरिक खूबियों पर कहीं ज्यादा ध्यान दे रही हैं । किसी भी शहर में कपड़ों, जूतों, गहनों के जितने बाजार इस वक्त नजर आ रहे हैं, उतने पहले कभी नहीं थे । भारतीय समाज में जिसे बार-बार ‘देवी’ कहा गया है, यह वही देवी है, जिसने अपने तमाम अधिकार पुरुष के हाथों में सौंपकर अपने लिए परिवार में एक सुविधाजनक जगह बनायी है ।
यह देवी अपने लिए बनायी गयी सीमाओं को नहीं लांघ सकती, क्योंकि ऐसा करते ही फिर वह अपने देवी पद से ही नीचे आ जाएगी । वह वहीं तक देवी रह सकती है, जहां तक पुरुष चाहे ये दरअसल पुरुष के भय ही हैं और है उनकी असुरक्षा की भावना । जो सत्ता उन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपी जाती रही है, उसमें इस भावना के साथ उन्हें बड़ा किया गया होता है कि वे स्त्री से कहीं ज्यादा सशक्त और समझदार हैं, स्त्री हर तरह से उनके ऊपर निर्भर है ।
मगर दूसरी तरफ वे उसे अपने प्रतिद्वंद्वी के रूप में भी पाते रहे हैं, जो समय-समय पर उनकी ताकत और बुद्धिमानी को चुनौती देती रही है । औरत को बहलाया गया बहुत तरह ऐसे में एक तरफ होती है खुद को बेहतर मानने की ग्रंथि और दूसरी तरफ असुरक्षा की भावना । सत्ता छिन जाने का डर, खुद के कमतर साबित होने का डर उन्हें स्त्री को दबाने, शोषित करने, उसे अपमानित करने के लिए किसी भी स्तर तक ले जा सकता है ।
किसी भी साजिश के लिए उकसा सकता है और सबसे आसान है औरत की शारीरिक सीमाओं को इतना महत्वपूर्ण बना देना कि उसका दिमाग, उसके सोचने-समझने की शक्ति का या तो इस्तेमाल ही न हो और अगर हो तो सिर्फ पुरुष की सुविधाओं के लिए, उसके बनाये संसार की देखभाल करने के लिए । औरत को बहलाया बहुत तरह गया है । उसे एहसास दिलाया गया है कि घर पूरी तरह से उसके हाथ में है ।
गृहस्थी संचालन कितना महत्वपूर्ण काम है । बच्चों की देखभाल करना यानी भविष्य संवारना । इस भविष्य संवारने में उसका खुद का वर्तमान कहां होता है ? उसकी खुशियां, उसकी इच्छा आकांक्षाएं सब त्याग के बहलावे में खत्म कर दी जाती हैं । जिस बेटी को, पढ़ाने-लिखाने में वह औरत अपना वर्तमान होम कर देती है, इतने त्याग और मेहनत से बड़ी हुई बेटी को फिर समझा दिया जाता है कि वर्तमान से उसका क्या मतलब, एक और पीढ़ी को भविष्य संवारने की सीख देकर उसका वर्तमान बलि चढ़ा दिया जाता है । यह सिलसिला चलता रहता है औरत मूलतः मां है यह दावा करके भी हमारे यहां उसका सम्मान करने का चलन है ।
बहुत से परिवारों के मुखिया अपनी मां की वाकई सेवा और देखभाल करते और करवाते नजर आते हैं, मगर उनकी अपनी पत्नी का दर्जा क्या होता है ? परिवार के किस निर्णय में उसकी भागीदारी होती है, कहां उसकी इच्छा को निर्णय प्रक्रिया में जगह मिलती है ? पिता की देखा-देखी, परिवार के बच्चे भी मां को बहुत महत्व नहीं देते हैं । आर्थिक रूप से सबल पिता ही उनके लिए आकर्षण, डर और इसी डर से मिले-जुले सम्मान का केंद्र होता है ।
क्या यह पत्नी मां नहीं होती है ? यह एक असहाय सदस्य होती है । सम्मान या प्यार लेना न लेना उसके हाथ में नहीं होता, परिवार के पुरुषों की मेहरबानी होती है । सेवा और देखभाल पाने वाली बूढ़ी मां भी इसी प्रक्रिया से गुजर कर आयी होती है ।
वृद्धावस्था में उसे उपेक्षा मिलेगी या सम्मान यह भी एक हद तक उसके बेटे पर निर्भर करता है जहां-जहां छवि की यह कैद औरत ने तोड़ी है और भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल होने से इनकार किया है, वहां हड़बड़ाहट में पुरुष ने औरत के इस स्वतंत्र अस्तित्व को लांछित तो किया ही है, उसे वापस उस छवि में ढकेलने की कोशिश भी की है । दूसरी तरफ एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में सामने आयी औरत से उसने पाया भी कम नहीं है । दुश्मन की तरह दो पालों में आमने-सामने खड़े होकर साथ-साथ जीवन बिताने का रिश्ता कभी भी सहज नहीं हो सकता ।
असहज संबंधों से उपजी ग्रंथियों के बीच स्त्री और पुरुष का यह नाता दोनों से ही बहुत कुछ छीन ले गया है । शोषक और शोषित आपस में बांट कर जीवन जीने का दावा करेंगे, तो वहां परिस्थितियां असहज होंगी और सहजीवन के दावे नकली । अब उस जानबूझकर साजिश के तहत बनायी गयी छवि को औरत ने अगर तोड़ा है, तो अपने बूते पर, अपनी समझ से । इस छवि को तोड़ने का खामियाजा भी बेशक उसने भुगता है, और भुगत रही है । मगर यह भुगतान क्या उस तकलीफ से बेहतर नहीं है, जहां उसे एक कम अक्ल व्यक्ति के तौर पर जीने को विवश किया जाता रहा है ।
डॉ विभा खरे
Published on:
08 Mar 2018 06:36 pm
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