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स्त्री क्यों ना बनाए स्वतंत्र अस्तित्व?

समाज ने उसे स्त्रीत्व के खांचे में बांधा

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Sunil Sharma

Jan 10, 2017

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- डॉ. विमलेश शर्मा

स्व-अस्तित्व को स्थापित करने वाला व्यक्ति अपनी लिए निर्धारित परिस्थितियों से परे जाकर स्वतंत्र परियोजनाओं में, निर्णयों में प्रतिबद्ध होकर स्वयं को पुनः प्राप्त कर सकता है। स्त्री भी यूँ तो स्वतंत्र जीव है पर समाज ने उसे स्त्रीत्व के खांचे में बांध दिया है। बतौर सिमोन समाज उसकी अतिक्रमण की क्षमता को कुंद करके उसको हमेशा के लिए अन्तर्वती अवस्था में रख देना चाहता है।

स्त्री जीवन का रोजनामचा यही है एक तरफ वह खुलकर हंसना चाहती है, जगत के लिए अनिवार्य होना चाहती है दूसरी ओर उसे उस स्थिति का सामना करना पड़ता है जो उसे हमेशा नगण्य बनाने पर तुली रहती है। काल्पनिक कहानियां उसे अद्वितीय रूप प्रदान करती है और वह है कि मानवी कहलाने के लिए, समझे जाने के लिए ही छटपटाती रहती है।

देह और देहरी के परे ना समाज सोच पाता है और ना ही उसे सोचने देता है। उनकी कुंठित नज़र और लुंठित सोच में पुरुष और स्त्री दो सर्वथा भिन्न सत्ता है जो कभी मानवीय व्यवहार, मित्रवत व्यवहार नहीं कर सकते। ओ सिमोन! जाने कितनी बातें हैं जो शायद तब भी यूँ ही थी और अब भी यूँ ही है....कहाँ कुछ बदला है...
-फेस बुक से साभार

लेखिका युवा साहित्यकार है।

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