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बिहार चुनाव: फीकी पड़ने लगी मोदी लहर? इन वजहों से बीजेपी को मिली शिकस्त

बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी के हार मानने के बाद चर्चाओं का बाजार गर्म है। कहा जा रहा है कि मोदी की लहर अब खत्म होने लगी है। जानें वो कारण, जिनके चलते बीजेपी को बिहार में हार का मुंह देखना पड़ा।

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pawan kumar pandey

Nov 08, 2015

बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी के हार मानने के बाद चर्चाओं का बाजार गर्म है। कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव से चली आ रही मोदी की लहर अब खत्म होने लगी है। बिहार में महागठबंधन की सरकार और नीतीश कुमार के हैट्रिक के बीच बीजेपी में हार के कारणों को लेकर मंथन होना शुरू हो गया है। इसी क्रम में जानें वो कारण, जिनके चलते बीजेपी को बिहार में हार का मुंह देखना पड़ा।

नीतीश कुमार की विकास पुरूष की छवि

बिहार में नीतीश कुमार की छवि विकास पुरुष की रही है। कहा जाता है कि नीतीश के विकास की रफ्तार थोड़ी धीमी है, पर उसका दूरगामी प्रभाव नजर आता है। नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू ने चुनाव से पहले अपनी इस छवि को भुनाने की कोशिश भी की। वहीं बिहार में पीएम मोदी की छवि सिर्फ भाषण देने वाले नेता के रुप में सामने आई।

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सीएम कैंडिडेट की घोषणा
बिहार में महागठबंधन के पास जहां सीएम कैंडिडेट के तौर पर विकास पुरुष नीतीश कुमार का चेहरा था। वहीं एनडीए गठबंधऩ की ओर सीएम उम्मीदवार को प्रोजेक्ट नहीं किया जाना नुकसानदायक साबित हुआ। दरअसल बिहार बीजेपी में ऐसा कोई बड़ा चेहरा सामने नहीं आया जिस पर जनता विश्वास कर सके।

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आरक्षण को लेकर आरएसएस का रुख
संघ प्रमुख मोहन भागवत का आरक्षण को लेकर दिए गए बयान के बाद से कहा जा रहा था कि बिहार की जनता बीजेपी से रुठ सकती है। हुआ भी कुछ ऐसा ही। विपक्षी पार्टियों ने भागवत के इस बयान को जमकर भुनाया, जिसका खामियाजा बीजेपी को झेलना पड़ा। हालांकि बीजेपी ने इस बयान से किनारा कर लिया था। बता दें कि संघ प्रमुख ने एक इंटरव्यू में कहा था कि आरक्षण नीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। उनका कहना है कि आरक्षण का राजनीतिक उपयोग किया गया है और सुझाव दिया कि ऐसी अराजनीतिक समिति गठित की जाए जो यह देखे कि किसे और कितने समय तक आरक्षण की जरूरत है।

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मुस्लिम और बीजेपी के बीच विश्वास की कमी
बीजेपी और मुस्लिमों के बीच हमेशा से विश्वास को लेकर विवाद रहा है। बिहार में मुस्लिमों का प्रतिशत 15% है। मुस्लिम वोटरों का आरजेडी समेत महागठबंधन का साथ देना तय माना जा रहा था। हालांकि बीजेपी को उम्मीद थी कि समाजवादी पार्टी और एमआईएम के आने से वर्ग विशेष के वोटों में बिखराव की संभावना है। वहीं दादरी में हुई हिंसा और उसके बाद बीजेपी नेताओं की ओर से जारी बयान ने वोटों को महागठबंधन के पक्ष में एकजुट होने की संभावना को और प्रबल कर दिया।

दलितों को लेकर केंद्रीय मंत्री का बयान

हरियाणा के फरीदाबाद में दो मासूम दलित बच्चों को जिंदा जलाकर मार देने की घटना के बाद केंद्रीय मंत्री वी के सिंह के बयान ने बीजेपी की छवि को धूमिल करने की कोशिश की। इस बयान के बाद विपक्षियों ने बीजेपी को दलित विरोधी होने का आरोप लगाया था। केंद्रीय मंत्री वी के सिंह ने कहा था- 'कोई कुत्ते को पत्थर मार दे तो उसके लिए सरकार कैसे ज़िम्मेदार है।'

स्थानीय मुद्दे रहे चुनाव से दूर
पूरे विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी के पास स्थानीय मुद्दों का अभाव साफ तौर पर देखा जा सकता था। बीजेपी जहां केंद्र राज्य संबंध की बात कर रही थी तो वहीं महागठबंधन का मुद्दा डी फॉर डेवलपमेंट न होकर डी फॉर दाल था। महागठबंधन हर रैली और हर बदलते चरण के साथ स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित होता गया लेकिन बीजेपी के पास स्थानीय मुद्दों का टोटा लगा रहा।

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