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Gujarat Innovation News Navachar कमल की डंडी के रेशे से बनाए इको फ्रेंडली कपड़े

त्वचा के लिए आरामादायक और आकर्षक कपड़े, बुनाई यंत्र का हासिल किया पेटेंट 10 महिलाओं को मिला रोजगार

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Gujarat Innovation News Navachar कमल की डंडी के रेशे से बनाए इको फ्रेंडली कपड़े

Gujarat Innovation News Navachar कमल की डंडी के रेशे से बनाए इको फ्रेंडली कपड़े

वडोदरा. शहर की एम.एस. यूनिवर्सिटी में पीएच.डी. कर रही शोध छात्रा सुमी हलदर ने कमल की डंडी के रेशे से इको फ्रेंडली कपड़ा बनाने की खोज की है। यह कपड़े सुंदर और आकर्षक और शरीर के लिए आरामदायक भी हैं। छात्रा ने साड़ी, थैले और अन्य कलात्मक चीजें बनाकर इससे आवक का जरिया ढूंढा है, उससे 10 महिलाओं को रोजगार भी प्राप्त हो रहा है।

छात्रा सुमी हलदर ने केले के तने की तरह ही कमल के फूल की डंडी से मानव शरीर के अनुकूल रेशे तैयार किए हैं। आमतौर पर कमल के फूल की इस डंडी का उपयोग कुछ नहीं होता और कचरे के रूप में फेंक दिया जाता है। सुमी की इस खोज ने वस्त्र उद्योग को नई राह दिखाते हुए कमाई का एक नया जरिया उपलब्ध कराया है। प्रोजेक्ट निर्देशिका से मिली मदद फैकल्टी ऑफ फैमिली एंड कम्युनिटी साइंस क्लोथिंग एंड टेक्सटाइल विभाग में सुमी पीएच.डी. कर रही हैं। उन्होंने कचरे के रूप में फेंक दिए जाने वाली कमल की डंडी के उपयोग पर शोध शुरू किया। कमल की डंडी के रेशे को उन्होंने कई तरह से उपयोगी देख इससे वस्त्र निर्माण की दिशा में कोशिश शुरू की तो बेहतर परिणाम मिले। सुमी की प्रोजेक्ट निर्देशिका डॉ मधु शरण ने उन्हें इस संबंध में मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कमल की डंडी से रेशे निकालने में मदद की। इसके बाद इससे कपड़े बनाने की प्रक्रिया शुरू की। कमल की डंडी से मिले रेशे को बोबिन पर लपेटा गया।

बुनाई के लिए भुजोड़ी के कारीगरों की मदद ली
सुमी ने कमल के डंडी से रेशा निकाल कर उससे कपड़े बनाने के प्रोजेक्ट में कच्छ जिले के भुजोड़ी के कारीगरों की मदद ली। इस काम के लिए उपयोगी यंत्र बनाने के लिए उन्होंने एक विख्यात कंपनी में काम किया। इस यंत्र को तैयार कर उन्होंने पेटेंट भी हासिल कर लिया है। हैप्पी फेसिस नामक एनजीओ की भी उन्होंने इस काम के लिए मदद प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने 10 महिलाओं को कमल की डंडी से रेशे निकालने का प्रशिक्षण दिया। इन महिलाओं के परिवार कोरोना काल के दौरान आर्थिक कठिनाई का सामना कर रहे थे। घर में मिले काम से इन्हें आत्मनिर्भर होने में सफलता मिली। सुमी की सफलता ने विभिन्न कपड़ा व्यापारियों को भी आकर्षित किया है। वे भी बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तैयार हुए हैं।

कमल की खेती करने वाले किसानों से मिली
सुमी ने वर्ष 2018 में कमल डंडी में रेशे की उपलब्धता को जानकर इससे कपड़े की बुनाई के बारे में सोचा। 2019 में इस पर काम शुरू किया। कमल की डंडी की अधिक मात्रा में जरूरत को देखते हुए वे खंडेराव मार्केट के फूूल विक्रेताओं से मिली। फूल विक्रेताओं ने सुमी को कमल की खेती करने वाले किसान इशा राठौड़ के बारे में बताया। राठौड़ गुलाबी और सफेद कमल की खेती कर हरिद्वार तक आपूर्ति करते हैं। छात्रा ने कमल की खेती को समझने के लिए विभिन्न तालाबों का भी दौरा किया, जहां प्रचूर मात्रा में कमल उगाए जाते हैं।

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