टीबी, एड्स और मलेरिया से भी अधिक स्ट्रोक से हो जाती हैं मौत विश्व स्ट्रोक दिवस को लेकर विशेष
अहमदाबाद. भारत में स्वास्थ्य समस्याओं में स्ट्रोक बेहद गंभीर होता जा रहा है। देश में प्रतिवर्ष स्ट्रोक के नए 15 लाख मामले सामने आते हैं, इसका औसत प्रतिदिन का लगभग चार हजार है। यह दर कई संक्रामक बीमारियों से भी अधिक है जो लंबे समय से सुर्खियों में हैं। प्रमुख अस्पतालों की इंसेटिव केयर यूनिटों में देखा जाए तो स्ट्रोक के मरीजों की संख्या दिल के दौरे के मरीजों से भी अधिक होती है। देश में कुल मौतों में से आठ फीसदी का कारण स्ट्रोक है, यह आंकड़ा टीबी, एड्स और मलेरिया से होने वाली कुल मौत संख्या से अधिक है।
10 साल में 100 फीसदी की वृद्धि
स्ट्रोक दिवस के उपलक्ष्य में अहमदाबाद के न्यूरोलॉजिस्ट एवं इंडियन स्ट्रोक एसोसिएशन के सचिव डॉ. अरविंद शर्मा ने बताया कि पिछले एक दशक की बात की जाए तो देश में स्ट्रोक के मामलों में 100 फीसदी से अधिक वृद्धि हुई है। इनमें 15 फीसदी की आयु 40 वर्ष से भी कम है। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, तनाव, निष्क्रिय जीवनशैली, धूम्रपान जैसे कारक इसके मुख्य कारण हैं।
स्ट्रोक के बाद हर मिनट लाखों कोशिकाएं हो जाती हैं नष्ट
इंडियन स्ट्रोक एसोसिएशन के सचिव डॉ.शर्मा के अनुसार स्ट्रोक के बाद हर मिनट लाखों कोशिकाओं की मौत हो जाती है। स्ट्रोक आने पर तत्काल उपचार पद्धति काफी कारगर हो सकती है। इससे जीवन और मौत के अंतर को काफी कम किया जा सकता है। विदेश की तुलना में भारत में ऐसे मरीजों को तत्काल उपचार उपलब्ध कराने की दर कम है।
जागरूकता जरूरी
चिकित्सकों के अनुसार स्ट्रोक के लक्षण और तत्काल उपचार के महत्व के बारे में लोगों को जागरुक करना जरूरी है। बुनियादी ढांचे में सुधार भी होना चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अस्पतालों में सीटी स्कैन, एमआरआई, कैथलैब्स और विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हों। इसके साथ ही स्ट्रोक के जोखिम वाले कारणों के बारे में लोगों को सजग करने की जरूरत है।