
वडोदरा. गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय के यूजीसी एमएमटीटीसी की ओर से पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान-परम्परा के समावेश के लिए 6 दिवसीय क्षमता संवर्धन कार्यक्रम आयोजित किया गया।
समापन समारोह में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के संयुक्त सचिव डॉ. गोपीचंद मेरुगु मुख्य अतिथि थे। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान-परम्परा कोई पृथक या विशिष्ट कार्यक्रम नहीं है, बल्कि इसका मूल उद्देश्य सभी विषयों की पाठ्यचर्या में भारतीय दृष्टिकोण, संकल्पनाओं एवं मूल्यों का समन्वित समावेश करना है। इसके माध्यम से शिक्षा को भारतीय चिंतन, जीवन-मूल्यों एवं समग्र विकास से जोड़ते हुए अधिक प्रासंगिक और जीवनोपयोगी बनाया जाता है।
उन्होंने कहा कि इस तरह के संवर्धन कार्यक्रमों का उद्देश्य विद्यार्थियों में भारतीय ज्ञान-परम्परा की समझ विकसित करना तथा पाठ्यक्रमों में इसका प्रभावी समावेश करना है। इसके माध्यम से चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व का समग्र विकास एवं भारतीय चिन्तनपरक शोध को प्रोत्साहन दिया जाएगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रभारी कुलपति प्रो. अतनु भट्टाचार्य ने कहा कि महज संस्कृत या पाली भाषा में ही भारतीय ज्ञान-परम्परा नहीं है, अपितु आधुनिक एवं आंचलिक भाषाओं में भी है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान-परम्परा को गहराई से जानने के लिए हमें दूसरी भाषाओं को भी जानना होगा। भारतीय ज्ञान-परम्परा एक विचार है।
यूजीसी एमएमटीटीसी के निदेशक सह विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. एच.बी. पटेल ने स्वागत किया। समन्वयक डॉ. जयप्रकाश सिंह ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। इस दौरान प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से नामित पर्यवेक्षक डॉ. रानी दाधीच भी उपस्थित रहीं। 6 दिनों में कुल 16 विषय विशेषज्ञों की ओर से कुल 27 सत्रों में अलग-अलग विषयों पर चर्चा की गई। 66 प्रतिभागियों ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया। डॉ. सत्यजीत देशपांडे ने आभार जताया। हिंदी अनुवादक दीपिका शर्मा ने संचालन किया।
Published on:
24 Jan 2026 10:40 pm
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