मनोचिकित्सकों की शरण
अहमदाबाद. कोरोना का असर भले ही अब नहींवत है, लेकिन पूर्व में हुए नुकसान का असर अब भी जारी है। कोरोना की लहर और खास कर लॉकडाउन के समय बच्चों की पढ़ाई के लिए इस्तेमाल किए गए मोबाइल फोन की लत अनेक बच्चों के लिए अब मुश्किल हो रही है। इन लत को छुड़ाने के लिए अभिभावकों को मनोचिकित्सकों की शरण में जाना पड़ रहा है। ऐसे बच्चों की संख्या कोरोना काल के पहले की तुलना में लगभग तीन गुना हो गई है।
बच्चों में मोबाइल फोन की बढ़ती लत व इसी तरह से जुड़े कुछ अन्य मुद्दों को लेकर पत्रिका संवाददाता ओम प्रकाश शर्मा ने अहमदाबाद स्थित गुजरात के सबसे बड़े सरकारी मानसिक आरोग्य अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक व गुजरात के स्टेट मेंटल हेल्थ के नोडल ऑफिसर डॉ. अजय चौहाण से बातचीत की। पेश है इस बातचीत के कुछ अंश:
सवाल: कोरोना काल में क्या कारण रहा होगा जिससे बच्चे मोबाइल फोन के आदि हो गए।डॉ. अजय चौहाण: कोरोना काल में बच्चों के लिए मोबाइल को लेकर छूट सी मिल गई थी। ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर बच्चों को आसानी से मोबाइल फोन मिल जाता था। उस दौरान बच्चों ने मोबाइल फोन का सदुपयोग भी किया होगा और दुरुपयोग भी। पढ़ाई के नाम पर रात भर ऑनलाइन गेम खेलने वाले बच्चों को इस तरह के परेशानी से जूझना पड़ रहा है। मोबाइल फोन नहीं मिलने पर अब उनका स्वभाव बदल जाता है और वे खुद को या फिर परिजनों को भी हानि पहुंंचाने से नहीं चूकते हैं।
सवाल: कोरोना काल का समाज पर किस तरह का असर मानते हैं?डॉ. चौहाण: देखिए, कोरोना काल का अब असर नहीं रहा है लेकिन इसका असर न सिर्फ शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी खूब हुआ था। अहमदाबाद के मेंटल हॉस्पिटल (मानसिक आरोग्य अस्पताल) की ओपीडी में कोरोना काल से पहले मोबाइल की लत छुड़ाने के एक माह में 10 से 12 मामले आते थे लेकिन अब यह संख्या 35 से 40 हो गई है। अनेक लोगों को एंजाइटी और डिप्रेशन इस कदर हावी हो गया है कि वे आए दिन ईसीजी कराते हैं। जबकि उन्हें दिल की बीमारी ही नहीं है। एंजाइटी और डिप्रेशन की वजह से ऐसा हो रहा है। लोगों को नींद नहीं आती है इसलिए अस्पताल में पहले की तुलना में लगभग 15 फीसदी तक नींद की गोलियों का उपयोग बढ़ा है।
सवाल: कोरोना की वजह से हर तरह से नुकसान हुआ था। आप को लगता है कि कोरोना का कोई सकारात्मक पहलू भी रहा होगा?डॉ. चौहाण: मुझे लगता है कि कोरोना काल से सबक लेकर लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने लगे हैं। मैं मानता हूं की पहले की तुलना में लगभग 25 फीसदी अधिक लोग योग, प्राणायाम या अन्य तरह से अपने आप को फिट रखने की कोशिश करने लगे हैं।
सवाल: मोबाइल को लेकर अभिभावकों को क्या कहना चाहेंगे?डॉ. चौहाण: वैसे मोबाइल फोन का उपयोग करना कोई गलत बात नहीं है। यदि आप बच्चों को मोबाइल फोन देते हैं तो नजर रखना जरूरी है। ऑनलाइन गेम के आदी होने के बाद जब ऐसे बच्चों को मोबाइल फोन नहीं मिलता है तो वे एग्रेसिव तो होते ही हैं साथ ही स्वभाव भी जिद्दी हो जाता है। खास कर ऐसे बच्चों की आयु आठ वर्ष से अधिक होती है। इस आयु में वे गलत और सही का आकलन नहीं कर पाते हैं। यदि ऐसे बच्चे हैं तो उन्हें काउंसलिंग या फिर मेडिटेशन की भी जरूरत पड़ सकती है।