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…तो मार्बल का विकल्प बनेगी सिरेमिक टाइल्स और ग्रेनाइट

खदानों पर चल रही सरकारी नियम-कायदों और अदालत की सख्ती से किशनगढ़ मार्बल मंडी पर खतरा मंडराने लगा है। खदानों से उद्यम की संजीवनी यानि कच्चे माल की आवक लगातार घट रही है। बेहतर गुणवत्ता का मार्बल तो नगण्य सा हो गया। मार्बल मंडी की सुनहरी चमक अब धुंधली पडऩे लगी है। अलबत्ता सिरेमिक टाइल धीरे-धीरे मार्बल

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सागर

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raktim tiwari

Nov 30, 2016

खदानों पर चल रही सरकारी नियम-कायदों और अदालत की सख्ती से किशनगढ़ मार्बल मंडी पर खतरा मंडराने लगा है। खदानों से उद्यम की संजीवनी यानि कच्चे माल की आवक लगातार घट रही है। बेहतर गुणवत्ता का मार्बल तो नगण्य सा हो गया। मार्बल मंडी की सुनहरी चमक अब धुंधली पडऩे लगी है। अलबत्ता सिरेमिक टाइल धीरे-धीरे मार्बल का विकल्प बनने की तैयारी में है। वैसे ग्रेनाइट भी मार्बल की कमी पूरी कर रहा है।

ग्राहकों की पहली पसंद

वैसे मार्बल खदानें पूर्ण रूप से बंद भी रहें तो भी मार्बल मंडी के गोदामो में एक साल तक के कारोबार का माल भरा है। जानकारों की मानें तो भवन निर्माण में गुजरात की सिरेमिक की टाइल्स मार्बल का तेजी से विकल्प बनने लगी हैं। मुरंड जैसी किसी मिट्टी व पाउडर से बनने वाली टाइल्स के कारखाने तेजी से फैल रहे हैं। राजस्थान के कई शहरों में सिरेमिक टाइल्स के बड़े-बड़े शोरूम खुल चुके हैं। वैसे किशनगढ़ की मार्बल मंडी में इनकी खास पहचान नहीं है, लेकिन ग्राहकों की पसंद व मांग बनी हुई है। चमक,कीमत व गुणवत्ता के लिहाज से टाइल्स ग्राहकों की पहल पसंद बनती जा रही है।

पनपना सजावटी सामान का कारोबार

किशनगढ़ की मार्बल मंडी में स्लेब व टाइल्स के अलावा हैंडीक्राफ्ट सामान का अच्छा कारोबार पनप चुका है। यहां के श्रमिकों के रोजगार की चिंता नहीं है। मंडी में भवन निर्माण से जुड़ी जालियां, पिलर, सीढ़ी, रंगोली, बॉर्डर पट्टी सहित कई चीजें बनाई जा रही है। यहां प्रतिमाओं का बड़ा कारोबार है। घरों के लिए मंदिर, गमले, फ्लावर पोट, लैम्प, मार्बल कुंडी, चकले-बैलन, मोमबत्ती व पैन स्टैण्ड, घड़ी, लालटेन, तोपें, ड्राइफूड स्टैण्ड, लोट्स सहित सजावटी सामानों की भरमार है।

हस्तकला आज भी जीवंत

हाइटेक मशीनों केयुग में भीहस्तकला जिंदा है। मूर्तियां व अन्य सजावटी सामान बनाने में भले ही मशीनों से काम हो रहा है, लेकिन इनको जीवंत बनाने में छैनी-हथोड़े का कोई विकल्प नहीं है। प्रतिमा को तराशने व सजावटी सामानों में जान डालने के लिए छीनी-हथोड़ा ही काम आ रहा है।

मकराना की अधिकतर खदानें भले ही बंद हो गई,लेकिन सजावटी सामानों के लिए अन्य खदानों का मार्बल पर्याप्त है। वैसे मकराना के मार्बल की चमक, क्वालिटी व उम्र का कोई मुकाबला नहीं है। यहां के मार्बल में केल्सियम का मिश्रण है जिससे इंसान के शरीर की हड्डियां मजबूत होती है। राजसमंद व अन्य स्थानों के मार्बल में आइरन की प्रचूरता के चलते चमक फीकी रहती है। मकराना मार्बल की आपूर्ति नगण्य होने से मजबूरी में लोग दूसरे मार्बल खरीद रहे हैं। हस्तकला उधोग भी इसी पर जिंदा है।

इनका कहना है

मार्बल की गुणवत्ता का कोई मुकाबला नहीं है। व्यावसायिक प्रतिस्पद्र्धा में भले ही आज सिरेमिक टायल्स या ग्रेनाइट आ जाएं, लेकिन मार्बल की पहचान छिपाई नहीं जा सकती। ग्राहकों की पसंद को कोई चुनौती नहीं दे सकता। मार्बल का कारोबार कम हो सकता है, लेकिन बंद कभी नहीं होगा।

सुरेश टांक, अध्यक्ष मार्बल एसोसिेशन

मार्बल की खदानें सिमटने का असर तो पड़ेगा,लेकिन कुछ सीमा तक हस्तकला उधोग इसकी भरपाई कर सकता है। मैं बरसों से मार्बल व्यवसाय से जुड़ा हुआ हूं। मुझे लगता है कि मार्बल पर संकट आया तो सिरेमिक टाइल्स विकल्प बन सकती है। ग्राहकों के बीच इस टायल्स की अच्छी इमेज बनती जा रही है।

रामस्वरूप सारस्वत,मार्बल व्यवसायी

आजकल किशनगढ़ की मार्बल मंडी में ग्रेनाइट की भी मांग बढ़ गई है। मार्बल के विकल्प के रूप में इसे भी माना जा सकता है। यहां करीब पचास स्थानों पर ग्रेनाइट के मशीनें काम कर रही है। खदानों से कच्चा माल ही नहीं आएगा तो मार्बल का व्यवसाय कम होना स्वाभाविक है।

पंकज पहाडिय़ा, मार्बल व्यवसायी


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