
खण्डार. कस्बे से करीब 20 किलोमीटर दूर चम्बल, बनास और सीप नदियों के संगम स्थल त्रिवेणी संगम के किनारे स्थित भगवान चतुर्भुजनाथ मंदिर क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र है। करीब चार सौ वर्ष पुराने इस मंदिर से राजस्थान के साथ मध्यप्रदेश के श्रद्धालुओं का भी गहरा जुड़ाव है। तीन नदियों के संगम पर स्थित होने से मंदिर और इसका परिसर धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।मंदिर से जुड़ी लोकगाथाओं और मान्यताओं के चलते यहां वर्षभर श्रद्धालुओं का आवागमन बना रहता है। श्रद्धालु भगवान चतुर्भुजनाथ के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामना के लिए प्रार्थना करते हैं। संगम स्थल पर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर दर्शन के साथ दीपदान भी आस्था का प्रमुख हिस्सा है।तीन नदियों के संगम पर 400 साल पुराना चतुर्भुजनाथ धाम है। वहां 43 साल से अखण्ड संकीर्तन हो रहे है। जहां तीन नदियां मिलती हैं, वहां चार सदियों से जल रही आस्था की अखण्ड ज्योति। चम्बल-बनास-सीप के संगम पर आस्था का दीप वहीं अमावस्या-चतुर्दशी पर जनसैलाब उमड़ता है। संगम किनारे अखण्ड ज्योति और संकीर्तन... होते है। चतुर्भुजनाथ धाम में हर माह लगता है आस्था का मेला लगता है।
43 साल से अखण्ड संकीर्तन
चतुर्भुजनाथ मंदिर में करीब 43 वर्षों से अखण्ड संकीर्तन की परंपरा जारी है। लगातार चलने वाले संकीर्तन से मंदिर परिसर में धार्मिक वातावरण बना रहता है। मंदिर में अखण्ड ज्योति भी श्रद्धा और निरंतर आस्था का प्रतीक बनी हुई है। श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करने के साथ अखण्ड ज्योति के दर्शन करते हैं।
संगम पर दीपदान की परंपरा
चम्बल, बनास और सीप नदियों के संगम पर दीपदान का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। श्रद्धालु पूजा-अर्चना के बाद संगम पर दीपदान करते हैं। मान्यता और आस्था के चलते राजस्थान तथा मध्यप्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से लोग यहां पहुंचते हैं। संगम का प्राकृतिक परिवेश और मंदिर की प्राचीन धार्मिक परंपराएं श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं।
अमावस्या-चतुर्दशी पर भरता है मेला
मंदिर परिसर में प्रत्येक माह अमावस्या और चतुर्दशी के अवसर पर मेला भरता है। इन अवसरों पर आसपास के क्षेत्रों के अलावा राजस्थान और मध्यप्रदेश से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। मेले में धार्मिक गतिविधियों के साथ मंदिर में दर्शन-पूजन और संगम पर दीपदान का क्रम चलता है।
करीब चार सौ वर्ष पुराना मंदिर, तीन नदियों का संगम, अखण्ड संकीर्तन और अखण्ड ज्योति इस धार्मिक स्थल की पहचान हैं। वर्षों से चली आ रही परंपराओं ने चतुर्भुजनाथ मंदिर को क्षेत्र की धार्मिक आस्था से जोड़ रखा है। हर माह अमावस्या और चतुर्दशी को लगने वाले मेले इस आस्था को और जीवंत करते हैं।
Updated on:
29 Aug 2026 06:01 am
Published on:
29 Aug 2026 06:01 am
