
गांधीनगर. जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें आचार्य महाश्रमण के सानिध्य में कोबा स्थित प्रेक्षा विश्व भारती में नवरात्रि के प्रारंभ के साथ आरंभ हुए आध्यात्मिक अनुष्ठान का क्रम बुधवार को भी जारी रहा। वीर भिक्षु समवसरण में उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं को आचार्य ने आध्यात्मिक अनुष्ठान के संदर्भ में अनेक मंत्रों का जप कराया। साध्वी सम्बुद्धयशा ने भी उदबोधन दिया।
आचार्य महाश्रमण ने चातुर्मास प्रवचन के दौरान आयारो आगम के माध्यम से पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जैसा संवेदन करोगे, वैसा ही संवेदन प्राप्त होगा। उन्होंने कहा कि स्वयं का किया हुआ कर्म स्वयं को ही भुगतना होता है। इसलिए किसी के हनन की इच्छा से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी आक्रोश, द्वेष अथवा लोभ आने से हिंसा भी कर सकता है। बताया गया है कि जैसा संवेदन तुमने दूसरों को दिया है, वैसा संवेदन तुम्हें ही भुगतना होगा। आदमी यह सोचे कि यदि आज हिंसा करूंगा तो आगे मुझे भी ऐसी संवेदना भोगनी होगी, इसलिए मुझे बुरे और हिंसात्मक कार्यों से बचने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्य ने कहा कि आदमी जैसा करता है, वैसा उसे भोगना होता है। इस बात को आदमी को ध्यान में रखते हुए हिंसा और हत्या से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी के छोटे-छोटे कार्य भी मानों रिकार्ड होते हैं। इसलिए यह विशेष रूप से ध्यान रखने का प्रयास हो कि स्वयं से किसी प्रकार की किसी भी प्राणी के प्रति गलत व्यवहार नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन में आदमी को पूर्णतया हिंसा से बचना तो बहुत मुश्किल है। गृहस्थ जीवन में जीवनयापन के लिए और रक्षा के लिए हिंसा अलग कोटि की हिंसा होती है। आदमी को संकल्पजा हिंसा से बचने का प्रयास करना चाहिए। गृहस्थ जीवन में हिंसा, चोरी, छल-कपट से बचने का प्रयास करना चाहिए। जहां तक संभव हो सके, ईमानदारी-नैतिकता व अहिंसा के पालन का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि आदमी जो भी कार्य करता है, उसे वैसा ही फल भी भोगना होता है। इसलिए आदमी को अधिक से अधिक पापों से बचने और स्वयं के कल्याण का प्रयास करना चाहिए।