
Minority Scholarship Fraud: कोरोना महामारी में देशभर में छात्रवृत्ति के मालों में ‘भौतिक सत्यापन‘ में दी गई छूट का फायदा साइबर ठग गिरोह ने ‘अवसर’ में बदल लिया। बांग्लादेश बॉर्डर पर पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर जिले के दासपाड़ा के चोपड़ा कस्बे का हर शख्स साइबर ठगी, ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसे अपराधों में लिप्त है। गिरोह देशभर में अल्पसंख्यक वर्ग के छात्रों की छात्रवृत्ति में सेंध लगाकर करोड़ों रुपए की चपत लगा चुका है। अजमेर की सिविल लाइंस थाना पुलिस की जांच में बड़ा खुलासा हुआ है।
सिविल लाइंस थानाप्रभारी शम्भूसिंह शेखावत ने बताया कि पुलिस अधीक्षक हर्षवर्धन अग्रवाला के निर्देश पर 2025 में दर्ज अल्पसंख्यक विभाग की छात्रवृत्ति घोटाले में जांच शुरू की। छात्रवृत्ति की रकम ट्रांसफर होने वाले खातों को खंगालने पर सामने आया कि घोटाले के तार पश्चिम बंगाल दिनाजपुर जिले के दासपाड़ा क्षेत्र स्थित चोपड़ा कस्बे से जुड़े हैं जो बांग्लादेश सीमा 300-400 मीटर दूर है। सक्रिय गिरोह छात्रवृत्ति, साइबर ठगी, ऑनलाइन धोखाधड़ी में लिप्त है। चोपड़ा कस्बा जालसाजी का दूसरा ‘जामताड़ा’ है। ठगी से मिली रकम का 50 प्रतिशत हिस्सा तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने वाले हैकर्स को देते हैं जबकि शेष राशि नेटवर्क से जुड़े अन्य सदस्य व डमी उम्मीदवारों के बीच बांट दी जाती थी।
अजमेर के सिविल लाइंस एसएचओ शंभुसिंह शेखावत ने बताया कि एसपी हर्षवर्धन अग्रवाला द्वारा दिनाजपुर के एसपी से बात करने के बाद स्थानीय पुलिस की विशेष टीम व बीएसएफ का सहयोग मिला। रात में चोपड़ा गांव में सर्च ऑपरेशन चलाकर कुछ मिनटों में दोनों आरोपियों को उठाकर निकलना पड़ा। संवेदनशील परिस्थितियों के कारण कार्रवाई को 10-15 मिनट में पूर्ण कर निकलना चुनौतीपूर्ण था। पुलिस जालसाज गिरोह के नेटवर्क की वित्तीय व तकनीकी कड़ियों को खंगाल रही है।
पुलिस के अनुसार छात्रवृत्ति घोटाले के अजमेर सहित डीडवाना, कोटपूतली, भरतपुर, नागौर, कोटा सहित देशभर में प्रकरण दर्ज हुए हैं। प्रारंभिक स्तर पर इन्हें सामान्य धोखाधड़ी व ठगी मानकर दर्ज किया गया लेकिन जांच आगे बढ़ने पर संगठित अंतर्राज्यीय साइबर नेटवर्क सामने आया।
पुलिस जांच में आया कि 2021-22 में कोरोना महामारी में केन्द्र व राज्य सरकार ने छात्रवृत्ति आवेदन के लिए भौतिक सत्यापन की अनिवार्यता समाप्त कर दी थी। इसी व्यवस्था में मौजूद खामी का फायदा उठाकर गिरोह ने शिक्षण संस्थानों के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डाइस कोड व संस्था की जानकारी जुटाकर फर्जी आवेदन कर स्वयं को संस्था प्रधान दर्शाते हुए आवेदनों का ऑनलाइन सत्यापन कर दिया।
पुलिस जांच में आया कि गिरोह ने आवेदन में छात्रों के नाम तो स्थानीय रखे, लेकिन उनके पीछे दर्ज पिता के नाम, पते बदल दिए। आधार कार्ड की प्रक्रियाओं को आसान बनाने के लिए ऐसे स्थानीय लोगों के नाम डाले जिनके आधार कार्ड उपलब्ध थे, ताकि ओटीपी आधारित प्रक्रिया सुचारू चलती रहे। बैंक खाते, आईडी अपने खुद के लगाए, इससे छात्रवृत्ति की राशि 3 लाख 16 हजार रुपए सीधे इनके खातों में ट्रांसफर हो गई। पुलिस अब गिरोह को ओटीपी उपलब्ध करवाने वाले की तलाश में जुटी है।