होली के उत्सव की शुरुआत डांडा रोपण के साथ होती है। डांडा का अर्थ है एक लकड़ी या स्तंभ। जिस स्थान पर होलिका दहन किया जाता है उस जगह पर कुछ दिन पहले एक लकड़ी रोपी जाती है जिसे होली का डांडा कहते हैं।
अजमेर. माघ शुक्ल पूर्णिमा पर रविवार को होली का डांडा रोपण के साथ फाल्गुन की बयार बहना शुरू होगी। मंदिरों में पूर्णिमा पर धार्मिक आयोजन होंगे। भगवान को नवीन पोशाक धारण कराकर पुष्पों से शृंगार और भोग लगाया जाएगा।वर्षों पूर्व डांडा रोपण के साथ होली पर्व की शुरुआत होती थी। अब धुलंडी और छारंडी पर ही त्योहार मनाया जाता है। इस बार फाल्गुन माह की शुरूआत 2 फरवरी से होगी। शहर सहित ग्रामीण इलाकों के मंदिरों, उद्यानों और सामाजिक संस्थानों में फागोत्सव शुरू होंगे। विभिन्न मंदिरों में श्रद्धालु अबीर-गुलाल व फूलों के साथ ठाकुरजी के संग होली खेलेंगे। भजन कीर्तन के कार्यक्रम शुरू हो जाएंगे।
अरंड-गुलर की सूखी लकड़ी शुभ
पंडित घनश्याम आचार्य ने बताया कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना त्योहार मनाना शुभ होता है। अरंडी अथवा गुलर की सूखी लकड़ी का डांडा रोपना चाहिए। शहर में होलीधड़ा, केसरगंज, रामगंज, सुभाष नगर, पंचशील, शास्त्री नगर, नया बाजार, पुरानी मंडी, मदार गेट, पड़ाव, अजयनगर, वैशाली नगर, फायसागर रोड, तोपदड़ा, नाका मदार, गुलाबबाड़ी, नसीराबाद रोड स्थित अन्य स्थानों पर डांडा रोपण किया जाता है। शहर के भीतरी इलाकों में बरसों से परंपरा जीवित है। नई पीढ़ी को भी इस अनूठी परंपरा से जोड़ने की कोशिश हो रही है।
होली के उत्सव की शुरुआत डांडा रोपण के साथ होती है। डांडा का अर्थ है एक लकड़ी या स्तंभ। जिस स्थान पर होलिका दहन किया जाता है उस जगह पर कुछ दिन पहले एक लकड़ी रोपी जाती है जिसे होली का डांडा कहते हैं। फिर इसके चारों तरफ लोग लकड़ियां, उपले और सूखे पत्ते इकट्ठा करना शुरू कर देते हैं जिससे होलिका का ढेर बन जाता है। फिर इस ढेर को होलिका दहन के दिन शुभ मुहूर्त में जलाया जाता है। लेकिन होलिका जलाने से पहले डांडे को निकाल लिया जाता है क्योंकि इस डांडे को भगवान विष्णु के भक्त प्रहलाद का प्रतीक माना जाता है। कई जगहों पर लोग दो डांडा भी रोपते हैं। जिनमें से एक को प्रहलाद का प्रतीक तो दूसरे को होलिका का प्रतीक माना जाता है। होलिका दहन के समय प्रहलाद के प्रतीक डांडे को निकाल लिया जाता है और होलिका के डांडे को जलने दिया जाता है।
होली का डांडा रोपण सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह शुभ कार्य समृद्धि, सुख-शांति और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। डांडा रोपण से होली के दौरान होलिका दहन के पवित्र अवसर की तैयारी पूरी होती है। माघ पूर्णिमा 1 फरवरी को है और होलाष्टक 24 फरवरी से प्रारंभ होगा। इसलिए स्थान और परंपरा के अनुसार लोग इन तारीखों में से किसी भी दिन डांडा रोपण कर सकते हैं।
यह होता हैं डंडा रोपण के बाद
डांडे के आसपास लकड़ी और कंडे जमाकर रंगोली बनाई जाती है । विधिवत रूप से होली की पूजा की जाती है। कंडे में विशेष प्रकार के होते हैं जिन्हें भरभोलिए कहते हैं। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूंज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं। होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए।