नगर निगम ने चार साल पूर्व शहर की 42 कच्ची बस्तियों को हटाने का निर्णय लिया था।
अलवर. नगर निगम ने चार साल पूर्व शहर की 42 कच्ची बस्तियों को हटाने का निर्णय लिया था। यानि इन बस्तियों को कच्ची बस्ती न मानकर नए नामों से संबोधित करना था, ताकि इन बस्तियों में रह रहे लोगों को बैंकों से आसानी से लोन मिल सके और जमीनों के पट्टे जारी हो सकें। वर्षों पहले इन बस्तियों के पट्टे एक रुपए में जारी हुए थे, इन पर बैंक लोन देने से इनकार कर देते हैं। नगर निगम की यह योजना अब तक धरातल पर नहीं आ सकी। इन कच्ची बस्तियों में करीब 10 हजार परिवार रहते हैं।
इन कच्ची बस्तियों में नंगली मोहल्ला, खोहरा मोहल्ला, दाउदपुर, खुदनपुरी, मूंगस्का, देवखेड़ा, सामोला, बल्ला बोड़ा, पहाड़ी की तलहटी में चमारपाड़ी, लालखान, अखैपुरा, धोबी घट्टा, गालिब सैय्यद, सेठ की बावड़ी, हजूरी गेट, गोपाल टाॅकीज, फतेहसिंह की गुम्बद, नारायण विलास, खदाना, करोली कुण्ड, सोनावा आदि शामिल हैं। कालाकुआं एरिया में भी कच्ची बस्तियां हैं। अब यहां के हालात बदल चुके हैं। ऐसे में लोग मांग कर रहे हैं कि उन्हें कच्ची बस्तियों से बाहर निकालकर सुविधाएं दी जाएं। लोग कहते हैं कि कच्ची बस्तियों के नाम से सम्मान पर भी ठेस लगती है।
नगर निगम उठाए कदम
निवर्तमान पार्षद अजय पूनिया कहते हैं कि आज शहर में कच्ची बस्तियां नाम की हैं। यहां सड़कों से लेकर नालियों के सभी कार्य हो गए हैं। इन्हें रिमूव करने की योजना चार साल पहले लाई गई थी, लेकिन नगर निगम इसे आगे नहीं बढ़ा पाया। लोगों को लोन समेत कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। निवर्तमान पार्षद विक्रम यादव का कहना है कि इन एरिया में आलीशान भवन बन गए हैं। ऐसे में इनको कच्ची बस्तियों से बाहर करने के लिए निगम कदम उठाए। निवर्तमान पार्षद देवेंद्र रसगनिया का कहना है कि वे इसको लेकर नगर निगम को कई बार पत्र लिख चुके हैं।