शहर में विरासत के नाम पर बड़ी हवेलियां, प्राचीन किले और बावडिय़ों के अलावा हरियाली से भरपूर पहाडिय़ां हैं जो साल भर पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। इसके साथ ही 60 से ज्यादा पर्यटक स्थल व धार्मिक स्थल है जहां देशी-विदेशी पर्यटक आते रहते हैं। पुराने पर्यटक स्थलों के साथ साथ पर्यटन विभाग व जिला प्रशासन नए पर्यटक स्थल भी विकसित कर रहा है। इससे पर्यटन की तस्वीर अब बदलने लगी है।
पर्यटन दिवस पर विशेष: पर्यटकों को लुभा रहे इको टूरिस्ट पैलेस, शहर में हवेलियां, प्राचीन किले और बावडिय़ों के अलावा हरियाली से भरपूर है पहाडिय़ां, जो करती है अपनी ओर आकर्षित
अलवर. शहर में विरासत के नाम पर बड़ी हवेलियां, प्राचीन किले और बावडिय़ों के अलावा हरियाली से भरपूर पहाडिय़ां हैं जो साल भर पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। इसके साथ ही 60 से ज्यादा पर्यटक स्थल व धार्मिक स्थल है जहां देशी-विदेशी पर्यटक आते रहते हैं। पुराने पर्यटक स्थलों के साथ साथ पर्यटन विभाग व जिला प्रशासन नए पर्यटक स्थल भी विकसित कर रहा है। इससे पर्यटन की तस्वीर अब बदलने लगी है। अलवर में इस साल जनवरी से अगस्त तक 450804 देशी व 8686 विदेशी पर्यटक अलवर आ चुके हैं। नए डेस्टिनेशन पिकनिक स्पॉट के रूप में बहुत पसंद किए जा रहे हैं।
इको टूरिज्म को बढ़ावा
पिछले कुछ सालों में प्रशासन ने इको टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए काम किया है। अलवर में वन विभाग की ओर से डहरा के समीप लवकुश वाटिका तैयार की गई है जो कि बहुत ही खूबसुरत है। बारिश के दौरान यहां का नजारा देखते ही बनता है। इसके साथ ही कटी घाटी पर भी नगर वन व कन्या उपवन भी बनाया गया है। जहां से पहाडों की सुंदरता के साथ-साथ कटी घाटी का नजारा भी देखा जा सकता है। यहां बायोडायवर्सिटी की तर्ज पर नीचे दीवारों पर पेंङ्क्षटग की गई है और ऊपर बैठने के लिए सुंदर जगह बनाई गई है। पर्यटक यहां से सेल्फी ले सकते हैं। इससे पहले बायोडायवर्सिटी पार्क जो कि बहुत बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है वहां प्राकृतिक हरियाली के साथ पहाडियों से गिरते झरने व आयुर्वेदिक उद्यान आकर्षक है। शहर के नजदीक होने के कारण यहां पर्यटकों का मेला लगा रहता है। दो साल पहले ही अलवर के सिलीसेढ़ के पार्क में भी यूआईटी ने पार्क तैयार किया था जिसमें कृत्रिम झरने हैं। मोतीडूंगरी पर भी नया पार्क तैयार किया है। जिसमें वुडन वर्क में झोपडीनुमा छतरियां बनाई गई जहां पर्यटक सेल्फी लेते हैं।
ऐतिहासिक शैल चित्रों पर नहीं पहुंच रहे पर्यटक
नेचर व इको टूरिज्म की ²ष्टि से अलवर शहर से करीब 10-12 किलोमीटर की दूरी पर हाजीपुर गांव में पहाडियों पर बने प्रागैतिहासिक शैल चित्र भी इतिहासकारा कारों को रिसर्स करने वालों को आकर्षित कर रहे हैं। गुफानुमा पहाडियों की चट्टानों पर शिकार और पशुओं के चित्रों के अलावा, शेर, हाथी, तलवार, मोर आदि को यहां उकेरे हुए हैं। इस तरह की पेङ्क्षटग मध्यप्रदेश के भीम बैठका नामक स्थान पर भी मिली है। अलवर में इन शैल चित्रों का प्रचार प्रसार नहीं होने से पर्यटक यहां तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।