Mahashivratri 2026: बारिश के दिनों में यह काला, चिकना और स्लेटी नजर आता है, जबकि ठंड के मौसम में इसका रंग गहरा काला हो जाता है। वहीं गर्मी के दिनों में शिवलिंग का रंग भूरा हो जाता है और इसकी सतह खुरदुरी व दरारों वाली दिखाई देने लगती है।
Mahashivratri 2026: बेमेतरा जिले में शिवनाथ नदी के तट पर स्थित ग्राम जौग का प्राचीन शिव मंदिर अपनी अद्भुत विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां स्थापित शिवलिंग स्वयंभू माना जाता है, जिसका रंग और स्वरूप प्रकृति के साथ बदलता रहता है। ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के अनुसार साल के 12 महीनों में यह शिवलिंग तीन अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है।
बारिश के दिनों में यह काला, चिकना और स्लेटी नजर आता है, जबकि ठंड के मौसम में इसका रंग गहरा काला हो जाता है। वहीं गर्मी के दिनों में शिवलिंग का रंग भूरा हो जाता है और इसकी सतह खुरदुरी व दरारों वाली दिखाई देने लगती है। यह प्राकृतिक परिवर्तन दूर-दराज के भक्तों के लिए कौतूहल और गहरी आस्था का विषय है।
ग्रामीणों के अनुसार, लगभग दो दशक पहले गांव के तालाब की खुदाई के दौरान काले पत्थर की अनेक प्राचीन प्रतिमाएं प्राप्त हुई थीं। इन बहुमूल्य मूर्तियों को तत्कालीन दुर्ग जिला प्रशासन को सौंपा गया था, जबकि कुछ मूर्तियों को मंदिर परिसर में ही सुरक्षित रखा गया है। प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि और सावन मास में यहां भव्य मेले का आयोजन होता है, जहां कुरुद, झलमला, राका और पथर्रा जैसे समीपवर्ती गांवों के अलावा अन्य जिलों से भी हजारों श्रद्धालु जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। सरपंच अश्वनी साहू और उपसरपंच मनोज साहू सहित ग्राम समिति के सदस्य निरंतर मंदिर की व्यवस्था और सुरक्षा का ध्यान रखते हैं।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह मंदिर 11वीं शताब्दी के फणि नागवंशी काल का माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण लगभग 700 वर्ष पूर्व हुआ था। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में प्राचीन शिलालेख और मूर्तियां बिखरी हुई हैं, जो इस स्थान के पुरातत्वीय महत्व को दर्शाती हैं।
एक लोक मान्यता यह भी है कि शिवनाथ नदी में भीषण बाढ़ आने के बावजूद आज तक यह शिवलिंग कभी जलमग्न नहीं हुआ है। पानी अधिकतम मंदिर की चौखट तक ही पहुंच पाता है। गांव के रामाधार साहू व खुबी राम दिलहरण ने बताया कि पूर्व में ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया था, जिससे इसकी संरचना सुरक्षित बनी हुई है।
अत्यधिक ऐतिहासिक महत्व होने के बावजूद, शासन-प्रशासन की ओर से इस पुरातात्विक धरोहर के संरक्षण में कमी देखी जा रही है। फरवरी 2016 में मंदिर के आसपास के 2 किलोमीटर के दायरे में राष्ट्रीय स्तर पर खुदाई की स्वीकृति मिली थी, लेकिन 10 वर्ष बीत जाने के बाद भी फंड के अभाव में कार्य प्रारंभ नहीं हो सका है। वर्तमान में बहुमूल्य शिलालेख और प्रतिमाएं खुले आसमान के नीचे पड़ी हैं, जिससे कई मूर्तियां धीरे-धीरे जमीन में दब रही हैं।
ग्रामीणों और सुनील शर्मा जैसे जागरूक नागरिकों ने चिंता व्यक्त करते हुए मांग की है कि प्रशासन जल्द से जल्द यहां सुरक्षा घेरा और पुरातात्विक कक्ष का निर्माण कराए, ताकि जिले की इस अनमोल विरासत को सहेजा जा सके।
जिले के देवकर-सहसपुर मार्ग पर स्थित सहसपुर एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल है। जनश्रुतियों के अनुसार, राजा सहस्त्रबाहु की भुजा युद्ध के दौरान यहां गिरने के कारण इसका नाम सहसपुर पड़ा। यहां स्थित प्राचीन शिव मंदिर अपनी नागर शैली की वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, जिसका निर्माण 13वीं-14वीं शताब्दी में कवर्धा के फणिनागवंशी राजाओं ने कराया था।
इस मंदिर का 16 स्तंभों वाला मंडप और अलंकृत वितान (छत) दर्शनीय है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर ब्रह्मा, विष्णु और चतुर्भुजी शिव के साथ विपरीत क्रम में अंकित नवग्रहों की दुर्लभ नक्काशी है। महाशिवरात्रि पर यहां विशाल मेले का आयोजन होता है, जो स्थानीय संस्कृति और आस्था का केंद्र है।
शिव मंदिर के समीप ही बजरंगबली का ऐतिहासिक मंदिर स्थित है, जिसके गर्भगृह में हनुमान जी की प्राचीन प्रतिमा प्रतिष्ठित है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार, आठ स्तंभों पर आधारित यह मंदिर भी फणिनागवंशी काल का है। इसकी बाहरी भित्तियों पर वेणुगोपाल, सात घोड़ों के रथ पर सवार सूर्यदेव, षड्भुजी नृत्य गणपति और भैरव की सुंदर प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं, जो उस काल की उत्कृष्ट मूर्तिकला को प्रदर्शित करती हैं।
वर्तमान में मंदिर परिसर को सुरक्षित घेरे में रखा गया है। यह स्थल न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि अपनी ऐतिहासिक और वास्तुकला संबंधी विशेषताओं के कारण पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए भी विशेष महत्व रखता है। जनप्रतिनिधि कमलेश साहू व टेकेन्द्र सिंह ने बताया कि मंदिर को राष्ट्रीय स्तर पहचान दिलाने के लिए प्रयास किया जा रहा है, जिसके लिए राज्य सरकार से प्रयास शुरू कर दिया गया है।