
benefic planets : जीवन में सभी लोग सफल होना चाहते हैं, धन-संपत्ति, अच्छे करियर और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। हालांकि अधिकांश लोगों को इसके लिए अथक संघर्ष करना पड़ता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार जातक की कुंडली में नवग्रहों की स्थिति और महादशाओं का प्रभाव, उसका भाग्य बदल सकते हैं। कारक और शुभ ग्रहों की दशाएं जहां अनुकूल फल देते हुए सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं वहीं अकारक, मारक ग्रहों की दशा में अशुभ फल मिलते हैं। ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार लग्नानुसार शुभ और कारक ग्रह की दशा, प्राय: जातक की तकदीर पलट देती है।
ज्योतिषाचार्य पंडित सोमेश परसाई बताते हैं कि सभी 9 ग्रहों में पारस्परिक मित्रता और शत्रुता होती है। कुछ ग्रह एक दूसरे के प्रति तटस्थ भाव भी रखते हैं। प्राय: केंद्र (1, 4, 7, 10) या त्रिकोण (1, 5, 9) भावों में स्थित ग्रह अच्छा फल देते हैं। उच्च राशि, स्वराशि में स्थित होने या उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ने पर उसकी महादशा भाग्यवर्धक मानी जाती है। इसके उलट 6, 8 या 12 वें भाव में स्थित ग्रहों की दशाएं जीवन की कठिनाएं बढ़ा सकती हैं।
वैदिक ज्योतिष में सभी 12 लग्नों के अलग अलग कारक, अकारक और मारक ग्रह भी हैं। कारक ग्रह (शुभ व लाभ देने वाले), अकारक ग्रह (उदासीन या अशुभ फल देने वाले) और मारक ग्रह (कष्ट या मृत्युतुल्य पीड़ा देने वाले) का निर्धारण लग्न के आधार पर ही होता है।
ज्योतिषाचार्य पंडित अरुण बुचके के अनुसार सामान्य नियम यह है कि त्रिकोण (1, 5, 9) के स्वामी कारक और द्वितीय एवं सप्तम भाव के स्वामी मारक होते हैं।
ध्यान रखें: ग्रहों के कारक, अकारक और मारक फल, कुंडली में उनकी तात्कालिक स्थिति, अंशबल, युति और महादशा पर भी निर्भर करते हैं।