
दुर्ग। Chhattisgarh News: पूजा-पाठ में केले का विशेष महत्व है। खासकर दीपावली में केले के फल के साथ पौधे और पत्तियों से तोरण द्वार सजाने की परंपरा है। इस दिन घरों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में मुख्य द्वार को केले के पौधे लगाकर सजाया जाता है। लिहाजा दीपावली में केले के फल के साथ पौधों की भी खासी डिमांड रहती है। इसके चलते जिले में केले की खेती पर भी रूझान बढ़ा है। जिले के किसानों के खेतों में इस बार भी केले के पौधे दीपावली की बाजार सजाने को तैयार हैं।
100 करोड़ का कारोबार
जिले में हर साल करीब 54 हजार मिटरिक टन केले की पैदावार होती है। थोक बाजार में इनकी कीमत औसत 2 रुपए किलो भी मानें तो इससे करीब 100 करोड़ का कारोबार हो रहा है। केले की खरीदारी व्यापारी किसानों के खेतों तक आकर कर लेते हैं। इससे बाजार के लिए भटकन के अलावा परिवहन की समस्या से भी मुक्ति मिल जाती है।
बांग्लादेश से अरब तक डिमांड
जिले में उत्पादित केले की डिमांड बांग्लादेश व पाकिस्तान के साथ अरब देशों में भी होती है। इसके अलावा देश में पश्चिम बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में अच्छी डिमांड है। इसके चलते बड़े शहरों के व्यापारी यहां के किसानों से संपर्क कर एकमुश्त पैदावार खरीद लेते हैं।
1894 हेक्टेयर में खेती
दुर्ग जिले में 1894 हेक्टेयर क्षेत्रफल में केले की खेती होती है। इससे करीब 53 हजार 90 मिटरिक टन केले की पैदावार होती है। केले के एक पौधे में कम से कम 25 से 35 किलो फल लगता है। एक एकड़ में 1200 से 1300 पौधे लगते हैं। इस तरह प्रति एकड़ पैदावार 30 से 35 टन प्रति एकड़ तक पैदावार निश्चित होती है। केले का एक पेड़ तीन सीजन तक फल देता है।