सुरेश जैन मध्य पूर्व में भड़की युद्ध की आग ने अब सीधे तौर पर राजस्थान के ‘मैनचेस्टर’ कहे जाने वाले भीलवाड़ा के कपड़ा उद्योग को अपनी चपेट में ले लिया है। इजराइल की ओर से ईरान पर किए गए दो बार हमलों में व्यापारिक और सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट को नुकसान पहुंचा […]
सुरेश जैन
मध्य पूर्व में भड़की युद्ध की आग ने अब सीधे तौर पर राजस्थान के 'मैनचेस्टर' कहे जाने वाले भीलवाड़ा के कपड़ा उद्योग को अपनी चपेट में ले लिया है। इजराइल की ओर से ईरान पर किए गए दो बार हमलों में व्यापारिक और सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट को नुकसान पहुंचा है। हमले के बाद इस पोर्ट को अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया गया है। इसका सबसे घातक असर भीलवाड़ा के टेक्सटाइल सेक्टर पर पड़ा है, जहां से इस पोर्ट के जरिए होने वाला 100 करोड़ रुपए से अधिक के कपड़े का निर्यात पूरी तरह ठप हो गया है। दरअसल यह एक ऐसा पोर्ट है जो भारत को अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया से जोड़ने वाले एक अहम गेटवे का रोल निभाता है।
भीलवाड़ा से अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों को कपड़े का निर्यात सालों से होता आ रहा है। पहले यह निर्यात पाकिस्तान के कराची पोर्ट के माध्यम से होता था। लेकिन, बीते समय में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनातनी और सीमा विवाद के चलते वह पारंपरिक मार्ग पूरी तरह बंद हो गया था। इसके बाद भारतीय निर्यातकों के सामने भारी संकट खड़ा हो गया था।
कराची मार्ग बंद होने के बाद भारत सरकार ने कूटनीतिक और व्यापारिक सूझबूझ दिखाते हुए ईरान के चाबहार में एक नया पोर्ट विकसित किया था। इस प्रोजेक्ट पर भारत ने 1100 करोड़ रुपए का निवेश किया था ताकि पाकिस्तान को बाईपास करके सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक माल पहुंचाया जा सके। चाबहार पोर्ट भीलवाड़ा के निर्यातकों के लिए एक संजीवनी बनकर उभरा था।
चाबहार पोर्ट के सुचारू होने के बाद से भीलवाड़ा का कपड़ा न केवल अफगानिस्तान, बल्कि रूस और उसके आस-पास के देशों में भी धड़ल्ले से जा रहा था। अब इजराइली हमले के कारण पोर्ट के बुनियादी ढांचे को पहुंचे भारी नुकसान से यह अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन अचानक टूट गई है।
इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से भीलवाड़ा के टेक्सटाइल निर्यातकों में हड़कंप मच गया है। जो माल रास्ते में था, वह फंस गया है और जो ऑर्डर तैयार हो रहे थे, उनकी डिलीवरी पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अगर यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है, तो भीलवाड़ा के कपड़ा उद्योग को करोड़ों का अतिरिक्त नुकसान उठाना पड़ सकता है, जिसका सीधा असर यहां के रोज़गार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।