
भोपाल। 125 से भी अधिक खून का आरोपी, 556 डाकुओं का सरदार, दो करोड़ रुपए के इनामी डाकू का नाम सुनकर आज भी मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तरप्रदेश के 25 जिलों के लोग सिहर जाते हैं। वह शख्स अब खौफ का पर्याय नहीं, बच्चों और अपराध करने वालों की भलाई करने वाला संत बन गया है। 96 वर्षीय पूर्व डाकू पंचम सिंह मंगलवार को भोपाल में थे।
70 के दशक में कुख्यात रहे पंचम सिंह ने पत्रिका से विशेष बातचीत में अपने डकैत बनने की कहानी बताई। mp.patrika.com पर जानते हैं पंचम सिंह को क्यों बंदूक उठाकर बीहड़ का रास्ता तय करना पड़ा, क्यों उन्हें फांसी की सजा देने के बाद माफी मिल गई...।
चौथी तक पढ़ाई करने के बाद उनकी पढ़ाई छूट गई और 14 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई। जिंदगी जैसे-तैसे चल ही रही थी कि 1958 में हुए पंचायत चुनाव की रंजिश में दूसरे दल के लोगों ने पंचम सिंह की जमकर पिटाई कर दी। काफी खून-खराबा भी हुआ। पंचम सिंह को काफी चोट आई। पंचम के पिता उन्हें बैलगाड़ी में लेटाकर अस्पताल ले गए और इलाज कराया। जब वे वापस ठीक होकर गांव लौटे तो पंचम और उनके पिता पर हमला कर दिया गया। दोनों को कई लोगों ने जमकर पीटा था।
पंचम सिंह क्यों बने डाकू
पंचम सिंह बताते हैं कि कई लोगों ने मिलकर मेरे पिता की भी पिटाई की थी। इसके बाद मैंने बदला लेने की ठान ली और डकैतों से जाकर मिले। इसके बाद डकैतों ने भी पंचम सिंह का साथ दिया और गांव में आ गए। वहां पंचम सिंह ने सबसे पहले छह लोगों की हत्या कर दी। पंचम ने बताया कि उनमें से एक व्यक्ति को तो उन्होंने पेड़ से बांधकर जिंदा जला दिया था। वे जमींदारों के सताने पर बदला लेने के लिए डाकू बन गए थे।
पहली बार की छह जमीदारों की हत्या
छह लोगों की हत्या करने के बाद पंचम सिंह डकैतों की गैंग में शामिल हो गए और चंबल के बीहड़ों में भाग गए। पंचम सिंह बताते हैं कि उस समय हमारे पास पुलिस से भी आधुनिक हथियार हुआ करते थे। लेकिन, उन्होंने यह नहीं बताया कि वे हथियार किससे खरीदकर लाते थे।
556 डाकुओं के सरदार बने पंचम
-देखते ही देखते पंचम सिंह 556 डाकुओं के सरदार बन गए।
-गिरोह चलाने का यह सिलसिला 14 सालों तक चलता रहा।
फिल्मों से अलग होते हैं डाकू
-वे बताते हैं हमारे गिरोह में काफी एकता थी।
-फिल्मों के डकैतों को उन्होंने बकवास बताया।
-डाकू किसी निर्दोष को परेशान नहीं करते थे।
-जुल्म करने वाले जमीदारों को लूटते थे।
-गरीबों की बेटियों की शादी करवाते थे।
-परिवार की रक्षा करने के लिए तैयार रहते थे।
-आदिवासी लोग भी डाकुओं की मदद करते थे।
-डकैत जीवन में भी मर्यादा का पालन किया।
-किसी महिला को बुरी नजर से नहीं देखा।
जिसे चाहते थे बना देते थे सरकार
पंचम सिंह का दावा है कि उनके गिरोह का इतना खौफ था कि वे बंदूक की नोंक पर जिसे चाहते थे उसकी सरकार में मंत्री बनवा देते थे। इसके अलावा वे खुद मध्यप्रदेश में समानांतर सरकार तक चलाने लगे थे। पंचम सिंह बताते हैं कि उनके घर पर पुलिस के आला अधिकारी से लेकर राज्य और केंद्र सरकार के मंत्री भी विभिन्न कार्यक्रमों में पहुंचते थे।
जब PM इंदिरा गांधी को किया था चैलेंज
-पंचम सिंह के बेबाकी के किस्से आज भी कहे जाते हैं। उन्होंने एक बार देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी चुनौती दे दी थी। पंचम ने कहा था कि या तो आपकी सरकार बनेगी या मेरी। एक डाकू की यह बात सुनकर इंदिरा गांधी काफी गुस्सा हो गई थीं।
बम से उड़ा तो पंचम को
इंदिरा गांधी ने गुस्से में आदेश जारी कर दिया कि चम्बल में बमबारी कर डाकुओं का सफाया कर दिया जाए। लेकिन, सरकारी फौज चंबल में बढ़ गई तो उन्होंने अपना रूप बदलकर काम शुरू कर दिया था।
जेपी को सौंपा था इंदिरा ने यह काम
इंदिरा गांधी को चुनौती मिलने के बाद जयप्रकाश नारायण को जवाबदारी सौंपी गई थी कि पंचम सिंह से समर्पण कराया जाए। जेपी की पहल के बाद पंचम सिंह ने अपनी आठ मांगें रखी थी। मांगें पूरी होने पर ही पंचम सिंह ने 1972 में अपने साथियों के साथ समर्पण किया था। समर्पण के बाद पंचम को खुली जेल में रखा गया।
दो करोड़ का था इनाम
पंचम सिंह ने बताया कि उनका आतंक इतना था कि उन्हें और उनके गिरोह के 556 सदस्यों को पकड़ने के लिए सरकार ने दो करोड़ का इनाम घोषित किया था। 1970 में प्रदेश सरकार से लेकर केंद्र की इंदिरा सरकार तक पंचम सिंह को नहीं पकड़ पाई थी।
माफ हो गई फांसी की सजा
पंचम के कारखानों की फेहरिस्त छोटी नहीं है। कई अपराधों के आरोपी होने के बाद कोर्ट ने उन्हें फांसी की जा सुनाई थी। लेकिन, सात साल की सजा काटने के बाद राष्ट्रपति को आवेदन किया गया और उनकी फांसी की सजा माफ कर दी गई थी।
कल का डाकू आज का संत
जिसके नाम से कभी चंबल और आसपास के क्षेत्रों के सैकड़ों गांव के लोग कांपते थे, आज वही कुख्यात डाकू संत बन गया है। वह ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के संपर्क में आने के बाद आज लोगों को काम, क्रोध, लोभ और मोह माया से दूर रहने की शिक्षा देता है। उस दौर में इंदिरा गांधी ने ब्रह्मकुमारी को डाकुओं का मन बदलवाने की चुनौती दी थी। इसके बाद डाकुओं का मन बदल गया और डाकू योगी बनकर संत जीवन जी रहे हैं।
बच्चों को देते हैं मर्यादा में रहने की शिक्षा
पंचम सिंह ईश्वरीय ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के संपर्क में आने के बाद अब बच्चों को ईश्वर में मन लगाने और मर्यादा में रहने की शिक्षा देते हैं। वे कहते हैं कि दृढ़ संकल्प, सत्य और एकता के बल पर कठिन परिस्थितियों को भी अपने वश में किया जा सकता है।
अब सरकारी तंत्र से परेशान
पूर्व दस्यु पंचम सिंह आज सरकारी तंत्र से परेशान हैं। लहार में उनकी जमीन है, जिस पर सरकार ने कई पेड़ कटवा दिए। इसके अलावा सरकार वहां दुकानें बनाना चाहती है। इसे लेकर पंचम सिंह कोर्ट चले गए। कोर्ट ने उन्हें स्टे दे दिया। इसके साथ ही कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद सरकारी तंत्र आदेश की अवमानना कर रहा है। इसी परेशानी को लेकर पंचम सिंह मंगलवार सुबह भोपाल आए। वे यहां मंत्री विधायकों के चक्कर लगा रहे हैं। हर जगह से उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिल रहा है।