पंडितों के अनुसार भद्रा में वर्जित माना गया है, शाम को भद्रा समाप्ति के बाद मध्यरात्रि तक होगा होलिका दहन। इस बार होलिका दहन में भद्रा नहीं बनेगी बाधक
भोपाल। होलिका दहन में इस बार भद्रा बाधक नहीं बनेगी। आमतौर पर होलिका दहन के दिन भद्रा का वास रहता है, कई बार शाम से रात्रि तक भी भद्रा की स्थिति रहती है, लेकिन इस बार भद्रा शाम होते ही समाप्त हो जाएगी, इसलिए होलिका दहन में यह बाधक नहीं बनेगी और शाम से रात्रि तक कई शुभ मुहूर्तों में होलिका दहन किया जा सकेगा।
होलिका दहन एक मार्च को होगा और दो मार्च को धुलेंडी पर्व मनाया जाएगा। होलिका दहन के साथ ही पांच दिवसीय होली उत्सव की शुरुआत हो जाती है। पूर्णिमा के दिन आमतौर पर भद्रा की स्थिति रहती है, लेकिन इस बार भद्रा शाम के बाद समाप्त हो जाएगी।
होलिका दहन का शुभ समय
पंडित जगदीश शर्मा के अनुसार भद्रा का वास इस बार पृथ्वी पर रहेगा और भद्रा की स्थिति सुबह ७:३० बजे से ६:४७ तक रहेगी। इसलिए होलिका दहन में भद्रा का कोई दोष नहीं रहेगा। पं. प्रहलाद पंड्या ने बताया कि आमतौर पर पूर्णिमा के दिन भद्रा की स्थिति बनती है। भद्रा काल में होलिका दहन शुभ नहीं माना जाता है, लेकिन इस बार भद्रा शाम को 6:47 बजे समाप्त हो जाएगी। इसलिए शाम 6:47 के बाद ही होलिका दहन करना शुभ होगा। भद्रा समाप्ति के बाद मध्यरात्रि तक होलिका दहन कर सकते हैं।
होलाष्टक की पौराणिक मान्यता
होलाष्टक क्या है इसके बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव ने कामदेव , जिन्हें प्रेम के देवता कहा जाता है को, फाल्गुन की अष्टमी के दिन ही भस्म किया था। कामदेव की पत्नी रति ने आठ दिनों तक भोलेनाथ से कामदेव को पुन जीवित करने के लिए प्रार्थनाएं की, उनकी अराधना की। रति की प्रार्थनाएं खाली नहीं गईं, भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया और कामदेव पुनजीवित हो गए। महादेव के इस निर्णय के बाद सभी ने रंगों का त्यौहार खेलकर खुशी मनाई।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार होली के आठ दिन पहले से ही विष्णु भक्त प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप ने उन्हें यातनाएं देनी शुरू कर दी थी। ईश्वर भक्त प्रह्लाद को इन आठ दिनों तक बहुत यातनाएं दी गईं, ताकि वो भगवान विष्णु की भक्ति छोड़ दे। इसलिए इन 8 दिनों तक कोई शुभ काम नहीं किया जाता।