MP News Township Development: टाउनशिप और बड़े आवासीय प्रोजेक्ट्स को विकसित करना अब नहीं होगा आसान, सरकार का बड़ा फैसला अब टाउनशिप के लिए इंटीग्रेटेड नियम ही होंगे मान्य
MP News Township Development: मध्यप्रदेश में टाउनशिप और बड़े आवासीय प्रोजेक्ट्स के विकास को लेकर सरकार ने महत्वपूर्ण बदलाव कर दिए हैं। अब मास्टर प्लान में लैंड यूज परिवर्तन करवाकर छोटे क्षेत्र में टाउनशिप विकसित करना आसान नहीं रहेगा। नगरीय विकास विभाग ने नगर तथा ग्राम निवेश नियम 2012 में संशोधन करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि टाउनशिप विकास के मामलों में अब इंटीग्रेटेड टाउनशिप पॉलिसी के प्रावधान प्रभावी होंगे। इसके बाद प्रदेश में 10 हेक्टेयर से कम क्षेत्र में टाउनशिप विकसित नहीं की जा सकेगी।
अभी तक एमपी के कई शहरों में मास्टर प्लान के तहत लैंड यूज बदलवाकर 2 हेक्टेयर जैसी छोटी जमीन पर भी आवासीय कॉलोनियां और टाउनशिप विकसित की जा रही थीं। सरकार ने फरवरी 2026 में इस संशोधन का प्रारूप जारी किया था। दावे-आपत्तियों के निराकरण के बाद मई से इसे अधिसूचित कर प्रभावी कर दिया गया है। संशोधन में नई धारा जोड़कर यह स्पष्ट किया है कि मास्टर प्लान या लैंड यूज परिवर्तन संबंधी प्रावधानों के बावजूद टाउनशिप के लिए इंटीग्रेटेड नियम ही मान्य होंगे।
नए नियमों से छोटे और मझोले डेवलपर्स की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। रियल एस्टेट क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे ज्यादा असर भोपाल और इंदौर जैसे शहरों में होगा। यहां 10 हेक्टेयर क्षेत्र जुटाना छोटे डेवलपर्स के लिए आसान नहीं होगा। वहीं पॉलिसी के तहत डेवलपर के लिए न्यूनतम 5 करोड़ की नेटवर्थ और 6 करोड़ रुपए का औसत वार्षिक टर्नओवर भी प्रभाव डालेगा। साथ ही टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग में पंजीयन के लिए 50 हजार रुपए खर्च करने होंगे, वहीं पांच साल बाद नवीनीकरण के लिए भी 25 हजार देना होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे और मझोले डेवलपर्स मध्यमवर्गीय और किफायती आवासीय योजनाएं विकसित करते हैं। ऐसे डेवलपर्स बाजार से बाहर होंगे तो एफॉर्डेबल हाउसिंग प्रोजेक्ट्स की संख्या घटने की आशंका है।
अब टाउनशिप संबंधी प्रस्तावों पर संचालक टाउन एंड कंट्री प्लानिंग की अध्यक्षता वाली समिति विचार नहीं करेगी। इसके स्थान पर नई साधिकार समितियां गठित की गई हैं। 5 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में सचिव नगरीय विकास की अध्यक्षता में समिति प्रस्तावों का परीक्षण-अनुमोदन करेगी। वहीं जिलों में अधिकार कलेक्टर की अध्यक्षता वाली समिति को है।