भोपाल

समाज में दुर्गा को शक्ति मानकर पूजा जाता है, लेकिन महिला को समाज में मिलता है दोयम दर्जा

शहीद भवन में नाटक 'मां रिटायर होती है' का मंचन

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Mar 09, 2019
समाज में दुर्गा को शक्ति मानकर पूजा जाता है, लेकिन महिला को समाज में मिलता है दोयम दर्जा

भोपाल। शहीद भवन में सघन सोसायटी फॉर कल्चर एंड वेलफेयर द्वारा 'रंग त्रिवेणी नाट्य उत्सव-5' के तीसरे दिन नाटक 'मां रिटायर होती है' का मंचन हुआ। नाटक का निर्देशन अशोक बुलानी ने किया है। नाटक में दिखाया गया कि औरत के मां, बहन, पत्नी, दोस्त के अलावा भी कई रूप ऐसे हैं। इतने सारे रूप और दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे नामों से संबोधित किए जाने के बाद भी महिलाओं को घर में वह सम्मान प्राप्त नहीं होता है, जो उन्हें प्राप्त होना चाहिए। महिला कभी माता-पिता की, कभी भाई, तो कभी पति और बच्चों की सेवा ही करती रह जाती है। ऐसे में अनेक रिश्ते रिटायर हो जाते हैं, पर औरत कभी रिटायर नहीं होती है।

नाटक की कहानी एक भरेपूरे परिवार की है, जिसमें एक बुजुर्ग दंपत्ति अपने दो बेटों और बहुओं के साथ रहते हैं। मां गृहिणी है और पति अपनी सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुका है। शादी के बाद दोनों बेटे अपनी शादीशुदा जिंदगी में खुश हैं। अचानक मां को एक दिन पता चलता है कि दोनों बेटे अपना-अपना अलग घर खरीदने की योजना बना रहे हैं। यह बात बूढ़ी मां को समझ नहीं आती और वो इस बात पर अपने बेटों से चर्चा करती हैं। बेटे सीधे-सीधे मुकर जाते हैं, लेकिन मां अपनी बात पर अडिग रहती है। इसी बात पर पिता भी बच्चों का समर्थन कर अपने काम पर ध्यान देने की बात कहते हैं।

रिटायरमेंट मांगती है मां
मां बोलती है कि मैं अपने दैनिक कामों को करते-करते थक चुकी हूं और अब मुझे रिटायरमेंट चाहिए। बच्चे कहते हैं, मां यह कैसा रिटायरमेंट है, पर वह अपनी बात पर अडिग रहती है और इसी बीच उसकी खुद की बेटी जो घर से भाग कर प्रेम विवाह करती है, वह आती है। वह प्रेग्नेंट है और डिलीवरी के लिए मायके आई है। मां तो रिटायर है, लेकिन वह कूटनीतिक तरीके से अपनी बहुओं से बेटी की भी सेवा करवाती है और अपने रिटायरमेंट का मजा भी लेती है। अंत में मां सारे कामों को छोड़कर समाज सेवा का निर्णय लेती है। तब तक पति भी अपनी पत्नी की भावनाएं समझ लेता है और बच्चों को आत्मनिर्भर कर समाज सेवा का निर्णय लेता है।

Published on:
09 Mar 2019 08:26 am
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