भोपाल

बेतहाशा बढ़ रही है राजनीतिक दलों की संख्या.. दलों का ‘दलदल’, नहीं दिखता ‘बल’

देश में बेतहाशा बढ़ रही है राजनीतिक दलों की संख्या.. दलों का ‘दलदल’, नहीं दिखता ‘बल’

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Sep 14, 2018
political parties

अनंत मिश्रा की रिपोर्ट...

आजादी के बाद देश में जितनी तरक्की राजनीतिक दलों ने की है, उतनी शायद और कोई नहीं कर पाएगा। मामला सिर्फ चंदे की कमाई तक सीमित नहीं है। साल-दर-साल राजनीतिक दलों की बढ़ती संख्या के आंकड़े भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं। पहले लोकसभा चुनाव में 53 राजनीतिक दलों ने भाग्य आजमाया था। 2014 के लोकसभा चुनाव में ये संख्या बढकऱ 464 तक पहुंच चुकी है। आश्चर्य होता है कि देश में इस समय सात राष्ट्रीय दलों को मिलाकर लगभग 2100 राजनीतिक दल हैं।

हम अपने आप को सबसे ’यादा मतदाताओं के आधार पर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश मानते हैं, लेकिन इसके साथ दूसरा पहलू भी जुड़ा है। ऐसे अनेक दल हैं, जिन्हें चुनाव में 100 वोट भी नहीं मिलते। इसके बावजूद ऐसे दलों पर अंकुश लगाने की कोई व्यवस्था नजर नहीं आती। आगामी दो-तीन महीनों में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। हर बार की तरह इस बार भी नए-नए दलों के बैनर तले नए चेहरे जनता की अदालत में वोट मांगते नजर आएंगे।

मध्यप्रदेश: 1951 के पहले विधानसभा चुनाव में 13 दल उतरे थे, 2013 में 66 ने ठोकी ताल

सन् 1951 में मध्य प्रदेश में हुए पहले विधानसभा चुनाव में 13 राजनीतिक दल चुनावी मैदान में उतरे थे। पिछले विधानसभा चुनाव में यह संख्या बढकऱ 66 तक पहुंच गई। 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा, कांग्रेस और बसपा को छोडकऱ 63 दलों का खाता भी नहीं खुला था। इनमें से 26 दल ऐसे थे, जिनके कुल मतों की संख्या तीन अंकों में ही सिमटकर रह गई थी। समझा जा सकता है कि जिस रा’य में तीन करोड़ अड़तीस लाख वोट डाले गए हों, वहां एक हजार वोट भी नहीं पाने वाले राजनीतिक दलों का जमीनी आधार क्या होगा?

उत्तरप्रदेश में तिहरा शतक: 2017 में हुए चुनाव में 302 दल मैदान में थे। सफलता सिर्फ आठ को ही मिली। 294 दलों का खाता भी नहीं खुला।

राजस्थान-छग की स्थिति

राजस्थान: पांच साल पहले हुए विधानसभा के चुनाव में 56
दलों ने किस्मत आजमाई, सफल पांच ही हुए। 51 दलों
का एक भी प्रत्याशी नहीं जीता। 19 राजनीतिक दलों को तो
एक हजार वोट भी नहीं मिले।

छत्तीसगढ़: प्रदेश ने 2003 में पहला विधानसभा चुनाव देखा था। तब 28 दलों ने ताल ठोकी थी। 2013 के चुनाव में यह संख्या 45 हो गई। इनमें से तीन ही विधानसभा तक पहुंचे।

इन सवालों पर क्यों न हो बहस?

चुनाव आयोग लंबे समय से चुनाव प्रणाली में सुधार के प्रयासों में जुटा है, लेकिन यह बहस भी अब मौजू है कि क्या आयोग को दलों के बढ़ते दलदल पर अंकुश लगाने की दिशा में सक्रिय होना चाहिए? इनमें से कितने दल किस मुख्य राजनीतिक दल के चुनावी गणित साधने के लिए पैदा किए गए? क्या इस छूट से लोकतंत्र का भला होगा? क्या दलों के पंजीयन के लिए कुछ सख्त नियम बनाने की संभावनाओं पर बहस होनी चाहिए?

सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्णय में कहा था कि चुनाव आयोग दलों को पंजीकृत तो कर सकता है, लेकिन उनकी चुनावी मान्यता रद्द नहीं कर सकता। आयोग इसे लेकर कई बार सरकार को लिख चुका है, लेकिन अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है। आखिरी बार आयोग ने कहा था कि ऐसे दल जो पांच साल में एक भी चुनाव में हिस्सा नहीं लेते, उनकी मान्यता रद्द करने का अधिकार आयोग को देना चाहिए। इस संबंध में अभी सरकार को फैसला लेना है।

एन गोपालस्वामी, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त

Published on:
14 Sept 2018 07:52 am
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