रवीन्द्र भवन में नाटक 'जलतरंग' का मंचन
भोपाल। रवींद्र भवन में आयोजित 29वें इफ्तेखार नाट्य समारोह के तहत शनिवार को नाटक 'जलतरंग' का मंचन किया गया। संतोष चौबे के उपन्यास पर केंद्रित नाटक का निर्देशन अशोक मिश्रा ने किया। दर्शकों के अनुसार यह बहुत बोझिल प्ले रहा। दो घंटे के इस नाटक में जैसे ही इंटरवल हुआ सभागार में आधी ऑडियंस कम हो गई। सभी युवा दर्शक यहां से उठकर चले गए।
दर्शकों के अनुसार इस नाटक की अवधि को कम करना चाहिए। जिसके लिए नाटक में ऐसे बहुत से दृश्य हैं जिसे एडिट करने की जरूरत है। वहीं नाटक की लाइटिंग में आकर्षक नहीं दिखी। नाटक के दृश्य में फ्री डाउट के वक्त उसकी टाइमिंग सही नहीं होने के कारण नाटक प्रभावित हुआ और दर्शकों को लुभा नहीं पाया।
दृश्य में भी दिखा बनावटी पन
इस नाटक में संगीत के दौरान जलतरंग वाद्ययंत्र बजाने के दृश्य में बहुत ही बनावटी पन दिखा, जो कि नाटक का टाटल भी है। लिहाजा प्ले के दौरान एक्टर को जलतरंग बजाने पर ध्यान देने की जरूररत है।
संगीत की विरासत की बात करता है
नाटक भारतीय शास्त्रीय संगीत की पारंपरिक विरासत की बात करता हुआ आधुनिक यथार्थ की विसंगतियों का प्रतिरोध भी करता है। नाटक की मूल कथा संगीत प्रेमी और जलतरंग वादक देवाशीष के इर्द-गिर्द घूमती है जिसमें संगीत के शोर में तब्दील होने और फिर शोर पर संगीत के विजय की दास्तान है।
इसमें क्लासिकल म्यूजिक का इतिहास, ध्वनि प्रदूषण, रोचक घटनाएं एवं दिलचस्प पात्रों का उपयोग हुआ है। अंत में नाटक संदेश देता है कि शोर हमारे जीवन को किस-किस तरीके से प्रभावित करता है। शोर चाहे लॉउडस्पीकर का हो या ट्रैफिक का या फिर गाडिय़ों का। शोर समाज के स्वास्थ्य, सुख-शान्ति को तहस-नहस करता है और संगीत समाज के स्वास्थ्य पर तो अ'छा प्रभाव डालता है।