
बृजमोहन आचार्य
Rajasthan News : राजस्थान में शिक्षा विभाग की ओर से चलाई जा रही योजनाओं, प्रचार और घर-घर सर्वे जैसे प्रयासों के बावजूद सरकारी स्कूलों में नामांकन लगातार गिर रहा है। कोविडकाल के अपवाद को छोड़ दें, तो पिछले छह वर्षों में सरकारी स्कूलों से करीब 20 लाख छात्र कम हुए हैं। इसके उलट, निजी स्कूलों में नामांकन में लगातार वृद्धि देखी गई है। जबकि निजी स्कूलों में इसी दौरान करीब 23 लाख छात्रों की बढ़ोतरी हुई है। कोविडकाल के दौरान सरकारी स्कूलों में बच्चों का नामांकन एक करोड़ तक पहुंच गया तब शिक्षा विभाग ने अपनी ही पीठ खूब थपथपाई थी लेकिन बीते छल साल में सरकारी स्कूलों को 20 लाख बच्चे छोड़ गए इस पर उनके पास कोई जवाब नहीं है।
शिक्षा सत्र - सरकारी बनाम निजी स्कूल
2018-19 - 82,58,519 - 83,27,250
2021-22 - 97,15,989 - 75,16,590
2024-25 - 78,03,846 - 98,20,465
2021-22 कोविडकाल सरकारी स्कूलों में कुल नामांकन था - 97,15,989
2024-25 घटकर रह गया - 78,03,846
(यानी तीन वर्षों में करीब 19 लाख छात्रों की कमी दर्ज की गई है)
1- 1.28 लाख शिक्षक पद रिक्त। एकल शिक्षक कई कक्षाएं संभालते हैं, जिससे शिक्षण गुणवत्ता प्रभावित होती है। बच्चों का स्कूल छोड़ने का खतरा बढ़ता है।
2- मुख्यमंत्री बाल गोपाल योजना में दूध वितरण में देरी। मिड-डे मील की गुणवत्ता खराब, जिससे बच्चों की उपस्थिति पर नकारात्मक असर पड़ा।
3- शिक्षकों की कमी से स्कूलों में तालाबंदी की घटनाएं हुई। शिक्षा विभाग नए विद्यार्थियों के लिए स्कूलों में कक्षा से लेकर शिक्षकों तक की व्यवस्था नहीं कर पाया।
4- छात्रवृत्ति योजनाएं अपर्याप्त, जिससे परिवार बच्चों को स्कूल भेजने में असमर्थ होते हैं।
5- ड्रॉपआउट रोकने के लिए प्रभावी निगरानी तंत्र नहीं। स्कूल प्रशासन और शिक्षा विभाग में जवाबदेही का अभाव, जिससे समस्याओं का समय पर समाधान नहीं होता।
6- सरकारी स्कूलों में व्यावहारिक और डिजिटल शिक्षा की कमी, जिससे बच्चे और अभिभावक निजी स्कूलों को प्राथमिकता देते हैं।