Bilaspur News: बिलासपुर जिले में फसलों से खरपतवार मिटाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला रासायनिक शाकनाशी पैराक्वाट अब किसानों की जान के लिए खतरा बन गया है।
Bilaspur News: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में फसलों से खरपतवार मिटाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला रासायनिक शाकनाशी पैराक्वाट अब किसानों की जान के लिए खतरा बन गया है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के मुताबिक, इसके संपर्क में आने वाले लोगों में मल्टी-ऑर्गन फेल्योर (कई अंगों का एक साथ काम बंद कर देना) का खतरा 70 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
इससे मृत्युदर भी 70 प्रतिशत है। देशभर में इस विषाक्त यौगिक से प्रभावित मरीजों की मृत्युदर बेहद ऊंची है। छत्तीसगढ़ में भी यह जहर तेजी से अपना असर दिखा रहा है। बिलासपुर जिले के छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) में पिछले छह महीनों में पैराक्वाट विषाक्तता से पीड़ित 26 मरीज इलाज के लिए पहुंचे, जिनमें 11 की मौत हो चुकी है। बाकी मरीजों की स्थिति भी गंभीर बताई जा रही है।
पैराक्वाट अत्यधिक विषैला शाकनाशी है, जो फेफड़े, लीवर और किडनी पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। दुनिया के 60 से अधिक देशों-जिनमें स्विट्जरलैंड, यूके, चीन और दक्षिण कोरिया शामिल हैं, ने इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। बावजूद इसके, भारत में इसका उपयोग खुलेआम जारी है। इसके लगातार बढ़ते मामलों को देखते हुए सिम्स बिलासपुर में इस पर विशेष रिसर्च शुरू की गई है। तीन सदस्यीय डॉक्टरों की टीम पैराक्वाट की विषाक्तता, असर और उपचार की संभावनाओं पर शोध कर रही है।
सिम्स बिलासपुर एमएस डॉ. लखन सिंह ने कहा की किसानों द्वारा खरपतवार नाशक का छिडक़ाव करते समय या बाद में संपर्क में आने से नर्वस सिस्टम, लीवर, किडनी और फेफड़े प्रभावित होते हैं। मेडिकल साइंस के पास अभी इसका कोई सटीक इलाज नहीं है। यही वजह है कि पैराक्वाट विषाक्तता के मामलों में मृत्युदर 70 प्रतिशत तक पहुंच गई है। किसानों को चाहिए कि वे इसके उपयोग से तुरंत परहेज करें।
पैराक्वाट का असर केवल खेत तक सीमित नहीं रहता। यह फसलों की जड़ और बीज तक पहुंचकर उत्पाद की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। ऐसे बीज और अनाज मानव शरीर में जाकर कैंसर और मल्टी-ऑर्गन फेल्योर जैसे रोगों का कारण बन सकते हैं। यह बेहद खतरनाक रसायन है, जिस पर शासन स्तर पर पूर्ण प्रतिबंध आवश्यक है।