बिलासपुर

हाईकोर्ट ने 7 याचिकाओं पर एक साथ पहली बार हिंदी में किया फैसला, जानें मामला..

Bilaspur High Court: बिलासपुर हाईकोर्ट ने पहली बार एक साथ 7 याचिकाओं पर हिंदी में सुनवाई कर हिंदी में ही आदेश पारित किया है।
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हाईकोर्ट ने 7 याचिकाओं पर एक साथ पहली बार हिंदी में किया फैसला, जानें मामला..
हाईकोर्ट ने 7 याचिकाओं पर एक साथ पहली बार हिंदी में किया फैसला, जानें मामला..

Bilaspur High Court: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट ने पहली बार एक साथ 7 याचिकाओं पर हिंदी में सुनवाई कर हिंदी में ही आदेश पारित किया है। इसके पहले अलग-अलग प्रकरणों में हिंदी भाषा में आदेश दिए जा चुके हैं, लेकिन एक साथ 7 याचिकाओं में पहली बार हिंदी में आदेश जारी किए गए हैं।

जांजगीर चांपा और सक्ती जिले के दूरस्थ ग्रामों में रहने वाले सावित्री साहू, भगवती देवांगन ,सुनील कुमार बंजारा धनेश्वरी, गायत्री मनहर, शशिकला यादव, कार्तिक राम ,भानु प्रताप, करण सिंह सूर्यवंशी , पूनम खरे, सुनीता कश्यप, देवकुमारी मरावी ,अनिरुद्ध सिंह छत्री , गनेशिया देवी, प्रेमा बाई खरे, गायत्री चांदने,आदि ने अधिवक्ता अब्दुल वहाब खान के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका प्रस्तुत की थी।

Bilaspur High Court: 45 दिन में निराकरण के विभाग को निर्देश

सभी याचिकाकर्ता जांजगीर-चांपा जिले के विभिन्न विकासखंडों में आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग द्वारा संचालित छात्रावासों में काफी वर्षों से दैनिक वेतनभोगी के रूप में कार्यरत थे। उक्त कर्मचारी सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग के अधीन अधीन विभिन्न अनुसूचित जाति कन्या, बालक छात्रावासों तथा आश्रमों में सफाई कर्मी, रसोईया आदि दैनिक मजदूरी के काम में नियुक्त किए गए थे।

परेशान होकर याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। जस्टिस एके. प्रसाद ने सहायक आयुक्त आदिवासी विकास जांजगीर चांपा एवं सहायक आयुक्त आदिवासी विकास सक्ती एवं अन्य को निर्देशित किया कि याचिकाकर्ताओं के अभ्यावेदन पर उनको पूर्ववत काम पर रखने एवं उनके बकाए का भुगतान करने संबंधी मामले का अभ्यावेदन मिलने के 45 दिवस के भीतर निराकरण करें। जस्टिस प्रसाद ने सभी याचिकाओं पर हिंदी में ही बहस सुनी और हिंदी में ही में आदेश पारित किया।

अचानक काम से हटाया, 3 साल से भुगतान भी नहीं

पिछले माह याचिकाकर्ताओं को विभिन्न कारण बताते हुए एकाएक काम से हटा दिया गया। इन सभी को जून 2022 से अब तक मजदूरी का भुगतान भी नहीं किया गया। इससे याचिकाकर्ता पूर्ण रूप से बेरोजगार हो गए और उनके सामने परिवार के भरण पोषण की समस्या उत्पन्न हो गई। काम पर रखने और बकाया का भुगतान प्राप्त करने के लिए वे अधिकारियों से लगातार निवेदन करते रहे। उसके बाद भी उन्हें काम पर नहीं रखा गया और ना ही उनके बकाए का भुगतान ही किया।