
Car Loan Mistakes: कार खरीदते समय कम EMI देखकर लोन लेना आसान फैसला लग सकता है, लेकिन यही फैसला लंबे समय में आपकी जेब पर ज्यादा बोझ डाल सकता है। कम EMI का मतलब अक्सर लोन की अवधि बढ़ना होता है और इससे कुल ब्याज ज्यादा चुकाना पड़ सकता है। इसलिए कार लोन लेते समय सिर्फ मासिक किस्त नहीं, बल्कि कुल चुकाई जाने वाली रकम, ब्याज दर, दूसरे चार्जेज, डाउन पेमेंट और लोन जल्दी बंद करने के नियम भी जरूर समझने चाहिए।
कार डीलर कई बैंकों और NBFC से जुड़े हो सकते हैं। इसलिए अलग-अलग संस्थानों की ब्याज दर, प्रोसेसिंग फीस, डॉक्यूमेंटेशन चार्ज और दूसरे खर्चों की तुलना करनी चाहिए। पहला लोन ऑफर ही सबसे सही हो यह जरूरी नहीं है। दो-तीन संस्थाओं के लोन में आने वाला थोड़ा सा अंतर भी कई साल में बड़ी रकम बन सकता है।
मान लीजिए 15,000 रुपये की EMI आपके बजट में आसानी से फिट बैठती है। लेकिन यह भी देखना जरूरी है कि यह EMI कितने साल तक देनी होगी। तीन साल की जगह पांच साल का लोन लेने से मासिक किस्त कम हो सकती है, लेकिन कुल ब्याज बढ़ सकता है। लोन लेने से पहले यह हिसाब जरूर करें कि पूरी अवधि में बैंक को कुल कितनी रकम चुकानी होगी।
कम डाउन पेमेंट देने से शुरुआत में आपके पास ज्यादा नकदी बचती है। लेकिन इससे ज्यादा रकम उधार लेनी पड़ती है। बड़ा लोन लेने से ज्यादा ब्याज और बड़ी EMI की संभावना हो सकती है। हालांकि, कार खरीदने के लिए अपनी पूरी बचत और इमरजेंसी फंड खर्च करना भी सही नहीं है। आपातकालीन जरूरतों के लिए पैसा बचाकर रखना जरूरी है।
टैक्स एवं निवेश सलाहकार बलवंत जैन के अनुसार, कई खरीदार ब्याज दर देखते हैं, लेकिन प्रोसेसिंग फीस, डॉक्यूमेंटेशन चार्ज, बीमा से जुड़े खर्च और समय से पहले लोन चुकाने पर फोरक्लोजर की शर्तों को नजरअंदाज कर देते हैं। ये सभी खर्च लोन की वास्तविक लागत बढ़ा सकते हैं। लोन लेने से पहले पूरी फीस सूची जरूर मांगें। साथ ही नियम और शर्तों को ध्यान से पढ़ें।
जैन का कहना है कि दो-तीन साल बाद आपकी आर्थिक स्थिति बदल सकती है। बोनस या वेतन बढ़ने पर आप लोन जल्दी खत्म कर सकते हैं। इसलिए पहले ही पता कर लें कि प्रीपेमेंट या फोरक्लोजर की सुविधा है या नहीं और इस पर कोई शुल्क लगता है या नहीं। अलग-अलग कार लोन में नियम अलग हो सकते हैं।