What is 8-4-3 Rule : यह नियम बताता है कि एसआईपी में असली ताकत कंपाउंडिंग और समय की होती है। शुरुआत में निवेश धीरे बढ़ता है, लेकिन लंबे समय तक टिके रहने पर रिटर्न तेजी से बढ़ने लगता है।
SIP Investment: इन्वेस्टमेंट की दुनिया में सबसे मुश्किल काम सही मौका पकड़ना नहीं है। सबसे मुश्किल काम है टिके रहना। यही वजह है कि कई लोग निवेश शुरू तो कर देते हैं, लेकिन बीच रास्ते में धैर्य खो बैठते हैं। जबकि असली कमाई तो उन लोगों की होती है, जो लंबे समय तक निवेश में बने रहते हैं। निवेश की दुनिया में एक नियम इन दिनों काफी चर्चा में है। इसे “8-4-3 Rule” कहा जा रहा है। यह नियम कंपाउंडिंग यानी चक्रवर्ती ब्याज की अहमियत बताता है। यह नियम बताता है कि कंपाउंडिंग शुरुआत में काफी धीमी चाल चलती है, लेकिन एक समय बाद ऐसी रफ्तार पकड़ती है कि पैसा खुद पैसा बनाना शुरू कर देता है।
हाल ही में फंड्सइंडिया की एक रिपोर्ट में इक्विटी, गोल्ड, डेट, रियल एस्टेट और लॉन्ग टर्म निवेश को लेकर कई दिलचस्प बातें बताई गई हैं। रिपोर्ट का सबसे बड़ा मैसेज यह है कि बाजार को समय दीजिए, क्योंकि लंबी अवधि में वही सबसे बड़ा हथियार साबित होता है।
मान लीजिए कोई निवेशक हर महीने 70,000 रुपये की SIP करता है और उसे सालाना 12 फीसदी रिटर्न मिलता है। ऐसे में पहला 1.1 करोड़ रुपये का फंड बनाने में करीब 8 साल लग जाते हैं। यहीं ज्यादातर लोगों का धैर्य जवाब दे देता है और पैसा निकाल लेते हैं। लेकिन कहानी इसके बाद तेजी से बदलती है। इस निवेश में दूसरा 1.1 करोड़ सिर्फ 4 साल में जुड़ जाता है। फिर अगला 1.1 करोड़ करीब 3 साल या उससे कम समय में बनने लगता है। यानी जैसे-जैसे समय बीतता है, पैसा तेजी से बढ़ने लगता है। 20वें साल तक स्थिति ऐसी हो सकती है कि पोर्टफोलियो हर साल करीब 1 करोड़ रुपये जोड़ने लगे। यही कंपाउंडिंग की असली ताकत है।
कंपाउंडिंग का असली खेल यही है। शुरुआती वर्षों में पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा आपकी जेब से डाले गए पैसों का होता है। लेकिन समय गुजरने के साथ रिटर्न का योगदान तेजी से बढ़ने लगता है। उदाहरण के तौर पर, जब फंड करीब 1.1 करोड़ रुपये तक पहुंचता है, तब इसमें लगभग 60 फीसदी पैसा निवेशक के योगदान का होता है और 40 फीसदी रिटर्न का। लेकिन जब यही पोर्टफोलियो 11 करोड़ रुपये तक पहुंचता है, तब तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। उस समय सिर्फ 6 फीसदी हिस्सा निवेश का होता है और बाकी 94 फीसदी ग्रोथ रिटर्न की वजह से आती है। यानी एक वक्त ऐसा आता है, जब आपका पैसा ही आपके लिए काम करने लगता है।
बहुत से लोग 2-3 साल निवेश करके ही नतीजे ढूंढने लगते हैं। लेकिन इक्विटी बाजार का असली रंग इतना जल्दी नहीं दिखता। रिपोर्ट के मुताबिक, शेयर बाजार में मजबूत और स्थिर रिटर्न की संभावना करीब 7 साल बाद ज्यादा बेहतर होने लगती है। इससे पहले उतार-चढ़ाव ज्यादा दिखाई देते हैं। लेकिन लंबी अवधि में यही अस्थिरता धीरे-धीरे कम होने लगती है। यानी इक्विटी का असली फायदा उन्हें मिलता है, जो कम से कम 7 साल या उससे ज्यादा समय तक टिके रहते हैं।
शेयर बाजार में गिरावट नई बात नहीं है। कभी मंदी, कभी ग्लोबल संकट, कभी ब्याज दरों का दबाव। बाजार में डर आता रहता है। लेकिन इतिहास बताता है कि लंबी अवधि में शेयर मार्केट ने निवेशकों को निराश नहीं किया है। रिपोर्ट के अनुसार, 5 से 20 साल की अवधि में इक्विटी निवेश ने लगातार डबल डिजिट रिटर्न दिए हैं। इसका मतलब साफ है कि बाजार का जोखिम स्थायी नहीं होता, लेकिन समय के साथ रिकवरी और वेल्थ क्रिएशन की संभावना मजबूत होती जाती है।
कंपाउंडिंग पहले बहुत स्लो लगती है। यही वह दौर होता है, जहां लोग SIP बंद कर देते हैं या बार-बार फंड बदलने लगते हैं। असल चुनौती पैसा लगाना नहीं, बल्कि लंबे समय तक निवेश में बने रहना है। क्योंकि असली जादू शुरुआती सालों के बाद शुरू होता है। जैसे किसान बीज बोने के अगले दिन फसल नहीं काटता, वैसे ही निवेश में भी धैर्य जरूरी है। जो लोग वक्त को मौका देते हैं, वही कंपाउंडिंग का असली फायदा उठा पाते हैं।