Stock Market News: भारतीय शेयर बाजार में पिछले 5 कारोबारी दिनों से लगातार गिरावट देखी जा रही है। दुनिया के दूसरे बड़े मार्केट्स में तेजी के बावजूद भारतीय बाजार में बिकवाली हावी है।
Why Share Market Fall: एक तरफ यूएस मार्केट नई ऊंचाई पर पहुंच रहा है और दूसरी तरफ भारतीय शेयर बाजार में गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही है। आज बुधवार को लगातार पांचवें कारोबारी दिन मार्केट में गिरावट है। शुरुआती कारोबार में 9 बजकर 50 मिनट पर बीएसई सेंसेक्स 0.29 फीसदी या 182 अंक की गिरावट के साथ 74,372 पर ट्रेड करता दिखा। इससे पहले मंगलवार को सेंसेक्स 1450 अंक गिरा था। इस तरह सेंसेक्स 5 कारोबारी दिनों में करीब 3600 पॉइंट टूट गया है। उधर निफ्टी आज गिरावट के साथ 23,362 पर ट्रेड करता दिखा।
भारत का शेयर बाजार इस वक्त दुनिया के बड़े बाजारों के साथ कदम मिलाकर नहीं चल पा रहा है। एक तरफ अमेरिका, ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के बाजार AI और सेमीकंडक्टर कंपनियों की बदौलत रिकॉर्ड स्तर पर हैं। वहीं, भारतीय बाजार विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, कमजोर रुपये और कंपनियों की धीमी अर्निंग ग्रोथ के दबाव में फंसा हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि यहां अभी तक Nvidia, Samsung या SK Hynix जैसी वैश्विक AI और चिप कंपनियां नहीं हैं। इस वजह से दुनियाभर का बड़ा निवेश उन देशों की तरफ जा रहा है जहां AI और सेमीकंडक्टर सेक्टर में तेज कमाई दिख रही है। भारत AI रेस से पूरी तरह बाहर नहीं है, लेकिन बड़े पैमाने पर सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग और AI इंफ्रास्ट्रक्चर में अभी हम काफी पीछे है। यही कारण है कि वैश्विक थीम आधारित निवेश फिलहाल भारत की बजाय ताइवान, जापान और दक्षिण कोरिया की तरफ जा रहा है। एसबीआई सिक्युरिटीज के फंडामेंटल रिसर्च प्रमुख सन्नी अग्रवाल के मुताबिक भारतीय शेयर बाजार में कमाई अब पहले जैसी नहीं रही। ऊपर से टैक्स और रेगुलेटरी नियमों ने विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी घटा दी है।
बीते वित्त वर्ष FY26 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPI ने भारतीय बाजार से करीब 1.8 लाख करोड़ रुपये की भारी-भरकम रकम निकाली है। एनएसडीएल के अनुसार, कैलेंडर ईयर 2026 में 12 मई तक एफपीआई शेयरों से 2.15 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं। यह 2.4 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड आउटफ्लो से थोड़ा ही कम है, जो कैलेंडर ईयर 2025 में देखने को मिला था। एफपीआई ने इस साल सबसे अधिक पैसा मार्च महीने में 1.17 लाख करोड़ रुपया निकाला है।
अप्रैल 2025 में डॉलर के मुकाबले रुपया जहां 85.6 पर था, वहीं मार्च 2026 तक यह गिरकर 94.65 तक पहुंच गया। 12 मई को रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर 95.63 तक फिसल गया था। विदेशी निवेशकों के लिए रुपये की यह गिरावट बहुत बड़ा झटका है। अगर शेयर बाजार से मिलने वाला रिटर्न ही रुपये की कमजोरी में खत्म हो जाए, तो निवेशक दूसरे बाजारों का रुख करने लगते हैं।
एफपीआई की भारतीय बाजार में पिछले 4 साल में कोई कमाई नहीं हुई है। डॉलर के हिसाब से 2021 के अंत से अब तक निफ्टी ने लगभग शून्य सालाना रिटर्न दिया है। रुपए की गिरावट ने पूरा मुनाफा मिटा दिया। यानी एफपीआई ने 4 साल से अधिक समय तक पैसा फंसाए रखा और रिटर्न मिला जीरो। इससे विदेशी निवेशकों का भरोसा टूटा है। ऐसे में वे भारत से पैसा निकालकर उन बाजारों की तरफ जा रहे हैं, जहां कमाई के मौके अधिक है।
मिडिल ईस्ट संकट ने आग में घी डालने का काम किया है। ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव और बढ़ गया, क्योंकि देश अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ती है, चालू खाते का घाटा बढ़ता है और RBI के लिए ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि इक्विटी बाजार पर लगातार दबाव बना हुआ है। अच्छे घरेलू आंकड़े भी निवेशकों का भरोसा पूरी तरह नहीं लौटा पा रहे हैं।
विदेशी निवेशकों की नाराजगी की एक और वजह टैक्स और ट्रेडिंग नियमों में हुए बदलाव हैं। साल 2024 के बजट में सरकार ने शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स 15% से बढ़ाकर 20% कर दिया है। वहीं, लंबी अवधि के मुनाफे पर भी टैक्स को 10% से बढ़ाकर 12.5% कर दिया है। सेबी ने डेरिवेटिव ट्रेडिंग के नियम भी सख्त कर दिए हैं। न्यूनतम लॉट साइज बढ़ा दिए गए हैं और ऑप्शन ट्रेडिंग की लागत भी बढ़ी है। इससे ट्रेडिंग एक्टिविटीज में सुस्ती आई है। उधर वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देश टैक्स के मामले में कहीं ज्यादा आकर्षक हैं। भारत का टैक्स ढांचा अब एक "प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान" बनता जा रहा है।
हालांकि, जानकार पूरी तरह निराश नहीं हैं। उनका कहना है कि भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था और लॉन्ग टर्म ग्रोथ स्टोरी अभी भी कायम है। उम्मीद जताई जा रही है कि FY27 की दूसरी छमाही में विदेशी निवेशकों की वापसी हो सकती है। लेकिन इसके लिए तीन बड़ी शर्तें पूरी होना जरूरी हैं। मिडिल ईस्ट तनाव कम हो, कच्चे तेल की कीमतें नीचे आएं और रुपया स्थिर हो। तभी बाजार में दोबारा मजबूत विदेशी निवेश लौट सकता है।
एफपीआई की इस लगातार बिकवाली का असर MSCI Emerging Markets Index में भी दिखा है। सितंबर 2024 में भारत का वेटेज करीब 21 फीसदी था, जो मई 2026 तक घटकर लगभग 12 फीसदी रह गया। दूसरी तरफ ताइवान अब सबसे बड़ा हिस्सा बन गया है। इसी दौरान चीन, ताइवान और दक्षिण कोरिया के बाजारों ने शानदार तेजी दिखाई, जबकि भारत डॉलर टर्म्स में पिछड़ गया।
टेक्निकल चार्ट्स पर देखें तो निफ्टी अब एक अहम मोड़ के करीब है। निफ्टी अब अपने पहले के कंसोलिडेशन रेंज से टूटने के बाद 23,150 के आसपास मौजूद गैप सपोर्ट जोन की ओर बढ़ रहा है। 23,800 का पिछला सपोर्ट लेवल अब किसी भी रिकवरी की स्थिति में मजबूत रेजिस्टेंस के रूप में काम कर सकता है।