
वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज के पूर्व प्रमोटर वेणुगोपाल नंदलाल धूत को बड़ा झटका लगा है। मुंबई स्थित नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने उन्हें दिवालिया घोषित कर दिया है। यह फैसला भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की उस याचिका पर सुनाया गया है, जिसमें धूत पर ब्याज और जुर्माने सहित 12,668.06 करोड़ रुपये बकाया होने का दावा किया गया था। इससे पहले धूत ने कर्ज चुकाने के लिए 600 करोड़ रुपये का प्रस्ताव दिया था, लेकिन कर्जदाताओं ने इसे मंजूरी नहीं दी थी। इसके बाद जुलाई में ट्रिब्यूनल ने उनका प्रस्ताव खारिज कर दिया था।
न्यायिक सदस्य विनय गोयल और तकनीकी सदस्य चरनजीत सिंह गुलाटी की पीठ ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 की धारा 126 के तहत एसबीआई की याचिका स्वीकार की। ट्रिब्यूनल ने कहा कि याचिका कानून में तय सभी जरूरी शर्तों को पूरा करती है, इसलिए इसे स्वीकार करना उचित है। एनसीएलटी ने आशीष नारायण को धूत की दिवालिया प्रक्रिया के लिए ट्रस्टी नियुक्त किया है। आदेश के मुताबिक, धूत की संपत्ति का कंट्रोल अब ट्रस्टी के पास रहेगा। वह संपत्तियों का प्रबंधन करेंगे और कानून के अनुसार कर्जदाताओं के बीच उनका बंटवारा करेंगे।
इस पूरे मामले की शुरुआत वीडियोकॉन समूह को दिए गए कर्ज से हुई थी। भारतीय स्टेट बैंक और उसके पूर्व सहयोगी बैंकों ने वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज और वीडियोकॉन टेलीकम्युनिकेशंस को टर्म लोन और वर्किंग कैपिटल के रूप में कर्ज दिया था। इन कर्जों के लिए वेणुगोपाल धूत ने पर्सनल गारंटी दी थी। जब कंपनियां कर्ज चुकाने में नाकाम रहीं, तो बैंकों ने फरवरी 2018 में धूत की व्यक्तिगत गारंटी को लागू कर दिया। इसका मतलब था कि कंपनियों के कर्ज की वसूली के लिए धूत की निजी संपत्तियों पर भी दावा किया जा सकता था। जून 2018 में वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज के खिलाफ कॉरपोरेट दिवाला प्रक्रिया शुरू हुई। बाद में अगस्त 2019 में समूह की 12 अन्य कंपनियों को भी इस प्रक्रिया में शामिल कर लिया गया।
दूसरी ओर, एसबीआई ने धूत के खिलाफ व्यक्तिगत गारंटर के तौर पर अलग से कार्रवाई शुरू की। 8 अप्रैल 2026 को एनसीएलटी ने बैंक की याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया था। उस समय ट्रिब्यूनल ने धूत की गारंटी वाले कर्ज में 6,157.57 करोड़ रुपये की चूक दर्ज की थी।
व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया के दौरान धूत ने कर्जदाताओं को 600 करोड़ रुपये चुकाने का प्रस्ताव दिया था। इसके लिए 36 महीने का समय मांगा गया था। धूत ने बताया था कि यह रकम पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में प्रस्तावित एक रियल एस्टेट प्रोजक्ट से जुटाई जाएगी। हालांकि, इस प्रस्ताव में कई ऐसी बातें थीं, जिन पर कर्जदाताओं को भरोसा नहीं हुआ। दिवाला समाधान पेशेवर ने पाया कि प्रस्ताव तैयार करते समय उनसे जरूरी सलाह नहीं ली गई थी। जबकि आईबीसी के नियमों के तहत ऐसा करना जरूरी है।
पूरी भुगतान योजना भविष्य में होने वाले निर्माण कार्य, जरूरी सरकारी मंजूरियों और परियोजना से मिलने वाली संभावित कमाई पर निर्भर थी। इन सभी अनुमानों की पुष्टि नहीं हो सकी। प्रस्ताव में कर्जदाताओं को तत्काल कोई रकम देने की व्यवस्था भी नहीं थी। इन्हीं वजहों से कर्जदाताओं ने प्रस्ताव को मंजूरी देने से इनकार कर दिया। 17 जुलाई को एनसीएलटी ने भी इसे खारिज कर दिया और धूत के खिलाफ चल रही व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया समाप्त कर दी। साथ ही कर्जदाताओं को उनके खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति दे दी।
इसके बाद एसबीआई ने फिर एनसीएलटी का रुख किया। बैंक ने 30 सितंबर 2026 तक ब्याज और जुर्माने सहित 12,668.06 करोड़ रुपये बकाया होने का दावा किया। ट्रिब्यूनल ने पाया कि बैंक की याचिका आईबीसी के कानूनी प्रावधानों के अनुरूप है और इसे तय तीन महीने की समयसीमा के भीतर दाखिल किया गया है। इसी आधार पर धूत को दिवालिया घोषित करने का आदेश दिया गया।